नई दिल्ली, 18 मार्च. रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने आखिरकार रविवार देर शाम प्रधानमंत्री को अपना इस्तीफा भेज दिया. न्यूज चैनलों के अनुसार फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि पीएम ने इस्तीफा मंजूर किया है अथवा नहीं. त्रिवेदी रेल मंत्री रहेंगे या नहीं इसका फैसला सोमवार को हो सकता है.

इस्तीफा भेजे जाने से पहले दिन में भी त्रिवेदी के सुर बगावत वाले लग रहे थे. लेकिन शाम को तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के कोलकाता से दिल्ली रवाना होने से पहले दिए गए इस बयान कि त्रिवेदी पार्टी की बात मानेंगे और इस्तीफा दे देंगे के बाद लगने लगा था कि त्रिवेदी दबाव में आ गए हैं.

समर्थन वापसी की धमकी

तृणमूल कांग्रेस ने त्रिवेदी को नहीं हटाने पर यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी दी है. ममता बनर्जी रविवार रात दिल्ली पहुंच रही है. ममता बनर्जी ने त्रिवेदी को हटाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया है. ममता ने प्रधानमंत्री से मिलने का समय मांगा है. ममता जल्द से जल्द त्रिवेदी को हटाना चाहती है क्योंकि उन्हें लग रहा है कि त्रिवेदी कांग्रेस के साथ हो गए हैं. ममता ने शनिवार को भी कहा था कि त्रिवेदी को हटाने पर फैसला अब प्रधानमंत्री को लेना है. ममता ने कहा कि उन्हें जो कुछ कहना था वह कह चुकी. अब सरकार को फैसला लेना है. हमारी ओर से मुकुल रॉय अगले रेल मंत्री होंगे. तृणमूल कांग्रेस के सांसदों की सोमवार को बैठक होगी.

शब्द बाणों की बौछार

त्रिवेदी ने इस्तीफा भेजे जाने पहले तक कहा था रेलवे किसी की निजी संपत्ति नहीं है. त्रिवेदी ने तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी को खरा खरा जबाव देते हुए कहा कि वह अब भी रेल मंत्री हैं. शनिवार को ममता बनर्जी ने कहा था कि वह त्रिवेदी के बारे में कोई बात नहीं करना चाहती क्योंकि उनके लिए त्रिवेदी रेल मंत्री नहीं है.

त्रिवेदी ने आरोप लगाया कि सुदीप बंदोपाध्याय ने रेल बजट पर पार्टी के भीतर राजनीतिक गड़बड़ी करवाई है. उन्होंने कहा कि बंदोपाध्याय ने ही रेल बजट को लेकर भ्रम पैदा किया. मैं अभी अभी रेल मंत्री हूं. ममता से बातचीत पर त्रिवेदी ने कहा कि किसी से कोई बात नहीं हुई है. हमें राजनीति की बजाय देश के बारे में सोचना चाहिए. मैं ममता बनर्जी का बहुत सम्मान करता हूं. मेरे दिल में उनके लिए काफी सम्मान है. वह महान नेता है. मुझे उनसे कोई परेशानी नहीं है. उन्हें अपनी राय रखने का हक है. मैं उनकी राय का सम्मान करता हूं.

मुलायम हो सकते है नए रेल मंत्री

नई दिल्ली. तृणमूल कांग्रेस के निरंतर बढ़ते दबाव से निजात पाने और मनमोहन सिंह सरकार को अगले दो साल के लिए राजनीतिक संकटों का बीमा कराने की खातिर कांग्रेस ने सपा का समर्थन जुटाने की कवायदें तेज कर दी हैं. समझा जाता है कि  मुलायम सिंह यादव को रेल मंत्री बनाने की भी पेशकश की जा रही है. सत्ता पक्ष के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि सपा अपने सदस्यों के समर्थन के बदले में मोलभाव कर रही है और वह इस बार 2008 की तरह मनमोहन सिंह सरकार की नैया सस्ते में पार कराने को राजी नहीं है. सूत्रों ने कहा कि मुलायम सिंह को रेल मंत्रालय देने के अलावा सत्तारूढ खेमा सपा को राज्यसभा के उपसभापति के साथ साथ उप राष्ट्रपति का पद भी देने को तैयार है.

लेकिन इसके बदले में कांग्रेस राष्ट्रपति पद पर अपने उम्मीदवार के लिए सपा से बिना शर्त समर्थन चाहती है. उपसभापति पद के लिए सपा के चाणक्य माने जाने वाले राम गोपाल यादव का नाम चर्चा में आ चुका है. उपराष्ट्रपति के लिए अपना उम्मीदवार सामने लाकर सपा राष्ट्रीय राजनीति में पूरी तरह काबिज हो सकती है. मनमोहन सिंह सरकार को सपा का समर्थन तृणमूल कांग्रेस के बजाए ज्यादा सटीक और फायदे का बेठता है क्योंकि सपा हर मुद्दे पर सरकार को दबाव में नहीं लेगी.

इसका कारण यह है कि मुलायम सिंह के सामने ममता बनर्जी की तरह वामपंथियों की रोज रोज की राजनीतिक चुनौती नहीं है. महंगाई से लेकर रिटेल क्षेत्र के तक के मुद्दों पर तृणमूल कांग्रेस वामपंथियों के संभावित हमलों को देखते हुए मनमोहन सिंह सरकार के कई कदमों को वीटो करती रही है. अपने अभूतपूर्व बहुमत के बल पर उत्तर प्रदेश में सपा के लिए वैसी चुनौती नहीं है और तृणमूल के 19 के बजाए सपा के 22 सदस्यों का लोकसभा में सरकार को सहारा मिल जाएगा. सूत्रों ने कहा कि सपा का समर्थन मिलने के बावजूद कांग्रेस अपनी पुरानी सहयोगी तृणमूल को खुद बाहर का रास्ता नहीं दिखाएंगी बल्कि सरकार अपनी मनर्जी करना जारी रखते हुए तृणमूल कांग्रेस को खुद समर्थन वापस लेने का रास्ता चुनने या सिर्फ सरकार से हटने के लिए मजबूर करेगी.

सरकार के राजनीतिक पंडितों को लगता है कि वामपंथियों की चुनौती के कारण तृणमूल कांग्रेस भी पूरी तरह केंद्र सरकार से पल्ला नहीं झाडऩा चाहेगी. दूसरी ओर मुलायम सिंह यादव बढ़ा हुआ रेल बजट अपने हाथों से पारित कराने को तैयार नहीं है. सरकार के पास इसका इलाज है. वह दिनेश त्रिवेदी को बजट सत्र का आधा हिस्सा पूरा होने तक रेल मंत्री बनाए रखेगी. सत्ता पक्ष यह बात स्पष्ट कर चुका है कि तृणमूल की इच्छा पूरी करते हुए त्रिवेदी को मंत्रालय से हटाया जा सकता है लेकिन किसको मंत्री बनाया जाए यह प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है. रेल राज्य मंत्री के रूप में मुकुल राय के पूर्व के व्यवहार का हवाला देते हुए सत्ता पक्ष उनके नाम पर राजी नहीं हो रहा है. असम में एक रेल दुर्घटना के समय हादसे के मौके पर जाने के प्रधानमंत्री के निर्देश को मुकुल राय ने मानने से इनकार कर दिया था. बनर्जी यह स्पष्ट कर चुकी है कि राय ही उनके लिए रेल मंत्री है.

केन्द्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के राजनीतिक प्रबंधकों को इस बात का पूरा भरोसा है कि दीदी अपनी बात पर अडेंगी और आखिरकार वह अपना मंत्री सरकार से हटा लेंगी. इससे रेल बजट त्रिवेदी के नेतृत्व में पारित होने और 30 मार्च के बाद मुलायम सिंह के रेल मंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा. उल्लेखनीय है कि 2008 में अमेरिका से परमाणु करार के मुद्दे पर जब वामपंथी दलों ने मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो सपा के समर्थन से ही सरकार का बाकी कार्यकाल पूरा हुआ था. उस समय उत्तर प्रदेश के चुनाव में अपने मुस्लिम मतदाताओं के रूठने के डर से सपा केंद्र की सरकार में शामिल नहीं हुई थी. लेकिन इस बार के चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं का सपा को भरपुर समर्थन ही नहीं मिला बल्कि यह भी देखने में आया कि उनका गुस्सा अब कांग्रेस के प्रति भी नहीं रहा है. कांग्रेस को इस चुनाव में अनेक सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं का खुला समर्थन हासिल हुआ. इस वजह से सपा की केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होने की हिचक भी दूर हो गई है.

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