भोपाल,27 मई,12  ‘बुंदेल केसरी’ छत्रसाल की 364वीं जयंती पर भोपाल में अखिल भारतीय बुंदेलखण्ड साहित्य एवं संस्कृति परिषद् के तत्वावधान में विविध कार्यक्रमों के साथ दो दिवसीय ‘बुंदेली समारोह-2013’  का समापन ऐतिहासिक सफलता के साथ सम्पन्न हुआ.

इस समारोह की विषेषता यह रही कि यह उत्सव कम चिंतन अधिक रहा कयोंकि देश भर से आये सैकड़ों लोक साहित्यकारो ने कई स़त्रों में बैठ कर सर्जनात्मक द्रष्टि से अधिक बातचीत ही नहीं की वरन शोध आलेख भी पढ़े. बुंदेली लोक कथाओं के लिये समर्पित इस आयोजन की अध्यक्षता कथाकार गोविंद मिश्र ने की. आयोजन की एक उपलब्धि यह रही कि जाने माने कवि कैलाष मड़बैया के उन्नीसवें प्रकाशित ग्रंथ’कितने पानी में हैं आपÓ कविता संग्रह का लोकार्पण मध्यप्रदेश के राज्यपाल रामनरेश यादव ने अत्यंत भव्य और गरिमापूर्ण कार्यक्रम में किया जिसमें ओरछेश मधुकर शाह नई दिल्ली, पं कपिल देव तैलंग,शंंभुदयाल गुरु,दतिया की डॉ कामिनी,सागर की षरद सिंह,पन्ना के पं.बृजवासीलाल दुबे,उरई के डॉ.रामस्वरुप खरे आदि अनेक स्थानों से आये साहित्यकारों ने अपने विचार व्यक्त किये. कृति की समीक्षा प्रस्तुत करते हुये जीवाजी विश्वविद्यालय के हिन्दी प्रध्यापक डॉ.लखन लाल खरे ने कहा कि यह कृति हिन्दी कविताओं के मध्य एक नया मील का पत्थर सिद्ध होगी.

दरअसल इसमें गीत भी है और अगीत भी.सच तो यह है कि भोपाल में भले कैलाश मड़बैया पर बुंदेली मात्र के स्तभ होने का ठप्पा लगा हो पर पूरे हिन्दी संसार में वे हिन्दी  कवि के रुप में ही जाने जाते हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि कभी मड़बैया जी धर्मयुग और कादम्बिनी में खूब छपते थे.शायद ही हिन्दी की कोई पत्रिका ऐसी हो जिसमें कैलाष मड़बैया की हिन्दी कविताओं को न पढ़ा गया हो.उन्होंने कहा कि इन कविताओं में वैष्वीकरण के खतरों पर बड़ी गम्भीरता से लिखा गया है.  राजेन्द्र चतुर्वेदी साहित्य सम्पादक ने कृति की समीक्षा करते हुये इस कविता संग्रह को गुलाब,केक्टस और तुलसी का गुलदस्ता ही कह दिया है. जिसमें व्यवस्था के कैक्टस का अधुनिक स्वरुप है तो गुलाब की रंगत एवं खुषबू भी है पर कवि इतने से संतुष्ट नहीं हुआ उसने तुलसीदल सी गॉव की रची पची स्मृतियॉ बयान की हैं तो सामाजिक सरोकारों को स्वस्थ रखने के लिये तुलसी की पत्तियॉं रोज सेवन करने की चेतना भी दी है.
विद्वानों का मत है कि यह कृति न केवल पढऩे येग्य है वरन् सहेजने योग्य भी है.

महामहिम राज्यपाल रामनरेष यादव जो कभी उत्तर प्रदेष के मुख्य मंत्री भी रहे हैं ,ने तो अपने उद्वोधन में खुलकर कवि कैलाष मड़बैया के वक्तव्य की प्रषंसा ही नहीं की वरन् उन्हें साधुवाद भी दिया. छिंदवाड़ा से आये उॉ. प्रभुदयाल श्रीवास्तव,छतरपुर के डॉ. गंगाप्रसाद गुप्त बरसैंया एवं डॉ.राधा वल्ल्भ षर्मा,जगदीष रावत ओरछा, लखनउ के गुलाबचंद केन्द्र निदेशक आकाषवाणी लखनउ, प्रोफेसर रचना त्रिवेदी जबलपुर ,अरविंद षुक्ला कानपुर, टीगमगढ के डॉ. दुर्गेश दीक्षित, जालौन के डॉ सुरेश चंद त्रिपाठी,ललितपुर के सुदेष सोनी, भिण्ड के  शिवेन्द्र सिंह,सागर विष्वविद्यालय के रिशव विश्वकर्मा, बीना के महेश कटारे, निवाड़ी के हर्षवर्धन चतुर्वेदी, बानपुर के बाबूलाल द्धिवेदी,बड़ा मलहरा के डा. देवदत्त द्धिवेदी,  गुना के प्राचार्य डॉ.जवाहर लाल द्धिवेदी, झॉसी के राम गोपाल प्रजापति,भोपाल,देवेन्द्र कुमार जैन, गौरीषंकर शर्मा गौरीश, साधना श्रीवास्तव,आषा एवं उषा श्रीवास्तव और प्रवीण कुमार श्रीवास्तव, उत्तर प्रदेश के डालचंद अनुरागी ,डॉ लखनलाल पाल उरई, कदीर खान रिसर्चस्कालर सेंवढ़ा,दिल्ली के डॉ.रजनीश, पन्ना  के अश्विनी दुबे ,डॉ रमन बिहारी सक्सेना,आदि लगभग एक सौ से अधिक अतिथि साहित्यकारों ने ,कवियों और बुंदेली कथाकारों ने न केवल अपनी लोक कथायें प्रस्तुत कीं वरन् अखिल भारतीय बुंदेली कविसम्मेलन में भी अपना उत्क्ष्ट काव्यपाठ किया.

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