बहुत बड़े स्तर की अवैध कमाई के बारे में अनुमान लगाया गया है कि यह सारी दुनिया में 320 खरब डालर या भारत के 17,600 अरब रुपये के बराबर है. इसे स्विटजरलैंड और केमेन, सेन्ट क्रिस्टोफर, आइल आफ मैन जैसे छोटे द्वीप राष्ट्रों के बैंकों में जमा है. ये छोटे देशों का खुद का कोई घरेलू विदेशी या अंतरराष्ट्रीय निवेश नहीं है. यह चौंकाने वाले तथ्य आ रहे हैं कि इन देशों के बैंक इस अपार विदेशी धन को ड्रग व हथियारों के तस्करों को देकर दुनिया में आतंक व अवैध धंधे का वित्तीय आधार बने हुए है. कई वर्षों पूर्व भारत में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में हवाई जहाज में आनंद मार्गी आतंकियों के आर्डर पर हथियारों की तस्करी की थी. इन्हें बुलगारिया से लाया गया था.

इस हवाई जहाज डेनमार्क व लुटेनिया के पायलट लाये थे. अभी हाल ही अरब राष्टï्रों में टुयुनिशिया, लीबिया ईजिप्ट, बहरीन,  यमन आदि कई राष्ट्रों में सत्ता के विरुद्ध हिंसात्मक जन विद्रोह हुए. उस समय यह उजागर हो गया कि लीबिया के तानाशाह मोहम्मद ओमर गद्दाफी व अन्य अरब राजनेताओं का धन इन अमेरिका सहित इन छोटे देशों के बैंकों में जमा था. अमेरिका ने ऐसे खातों को जब्त भी कर लिया था. जैसे भारत में बुलगारिया से हथियारों की तस्करी की गई. उसी तरह श्रीलंका के आतंकी संगठन लिट्ट को सिंगापुर से हथियारों की तस्करी होती थी. भारत में भी नक्सली तस्करी व चोरी के हथियारों से फौजी स्तर पर बड़े हमले कर पा रहे है.

आजादी से पूर्व और बाद में भी भारत के राजा नवाब विदेशों में अपना अवैध रुपया छुपा कर रखते थे. यह भी चर्चा में है कि न्यूयार्क के एक बैंक ”गुलाब सिंह-रीवा”  इस नाम से काफी धन जमा है. ऐसा माना जा रहा है कि ये गुलाब सिंह वही है, जो रीवा के महाराजा थे. अब किसी को भी इस खाते का दावेदार नहीं माना. यह भी जानकारी में आया है कि आजादी बाद और रियासत के विलय से पहले निजाम हैदराबाद ने पाकिस्तान के बैंक में अपना काफी धन जमा किया था, जो अभी भी वहां उलझा पड़ा है. निजाम उस्मान अली मर चुके हैं और उनके वारिसों को उनका वारिस नहीं माना जा रहा है.

काले धन के बारे में यह भी अनुमान हो रहा है कि इसमें व्यापारियों व उद्योगपतियों का इतना धन नहीं है, जितना भ्रष्टï राजनेताओं, अपराधियों व तस्कारों का है. व्यापारी व उद्योगपति स्वभाव से ही पूंजीनिवेश में विश्वास करता है. उसे ऐसा काला धन ‘डेड मनी’ लगता है. उसका लक्ष्य ब्याज कमाना नहीं, बल्कि मुनाफा कमाना होता है. भारत में जब राष्ट्रीयकरण के नेहरू युग में सरकारी उपक्रम, सरकारी निवेश व निजी धंधों का राष्ट्रीयकरण का दौर चला, उसी समय स्वराज पाल जैसे उद्योगपति, पूंजी निवेश के लिये ब्रिटेन में जाकर बस गये. बिड़ला ग्रुप को जब यहां निवेश के लिये पर्याप्त अवसर नहीं दिये गये तो उन्होंने थाईलैंड जाकर निवेश व उद्योग में वहां अपना सिक्का जमाया.

अभी तक यह धारणा थी कि सिर्फ भारत के लोगों का ही स्विस व अन्य देशों के बैंकों में धन जमा है, लेकिन अब यह भी जग जाहिर है कि सारे दुनिया के देशों के कई लोगों ने अपना धन दूसरे देशों में छुपा कर जमा कर रखा है. इसमें चीन, रूस, ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा भी शामिल हैं. ज्यादातर काला धन भ्रष्ट नेताओं, अपराधियों, ड्रग व हथियार तस्करों का है. दुनिया में आतंक इन्हीं के इशारों, वित्तीय व हथियारों से चलता है. आतंक चलते रहने से ही उनका धंधा चलता है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

Related Posts: