कार्बाइड के रासायनिक कचरे का महत्व देखिये कि यह 28 साल सन् 1984 से भोपाल के कारखाने में अटल पड़ा है. मूल कारखाना तो उसी दिन बन्द हो गया जब गैस रिसी और बाद में मशीनें भी उखड़ गईं. लेकिन वह जो कचरा कर गया वह अभी भी उस कारखाने का स्मारक बना पड़ा है.

कचरे की खुद की तो कोई कीमत होती नहीं, लेकिन उसको उठाने की कीमत बहुत होती है. मध्यप्रदेश सरकार में गैस त्रासदी मंत्री श्री बाबूलाल गौर कार्बाइड कचरे के साथ-साथ नगरों में होने वाले कचरों से भी इतने ही परेशान हैं. ‘स्पाट फाइनÓ भी कचरा ‘क्लीनÓ नहीं कर पा रहा है. वही हाल कार्बाइड के कचरे का है. इसे भोपाल से उसी जगह किसी भी तरह खत्म नहीं कर पाये इसलिये इसे इन्दौर के पास पीथमपुर ले जाना तय हुआ, लेकिन वहां के लोगों ने भी यह तय कर लिया कि इस ‘कचरेÓ को तो यहां किसी भी हाल में नहीं आने देंगे. तब यह तय हुआ कि नागपुर ले जाकर रक्षा विभाग के इन्सीनेटरों में जलाया जाएगा. लेकिन नागपुर के लोगों व महाराष्ट सरकार ने भी ‘तय’ कर लिया कि इसे यहां किसी भी कीमत पर नहीं लाने दिया जायेगा.

देश में सबने मना कर दिया तो जर्मनी से खुद एक कम्पनी इसे उठाने के लिये आयी हुई है. केन्द्रीय गृहमंत्री श्री चिदम्बरम, केन्द्रीय विधि मंत्री श्री सलमान खुर्शीद ने बताया कि 8 जून को दिल्ली में ग्रुप ऑफ मिनिस्टर इस पर फैसला लेगा. संभवत: यह जर्मनी ही भेजा जायेगा. यह बड़ा खेद का विषय है कि कचरे की समस्या भी हम शासकीय और हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट जाकर भी हल नहीं कर सके. एक विदेशी कम्पनी आकर कहती है हमसे एग्रीमेंट करो, हम ले जायेंगे. जाहिर है वे भारत की इस मजबूरी का फायदा भी उठायेंगे और इस कचरे को ले जाने के लिये उनके भारी मुनाफे की रकम हमसे वसूल करेंगे. कचरे के भी क्या भाग्य हैं कि वह विदेश जा रहा है. लगता है हमें अपने सभी कचरों का निर्यात करना पड़ेगा.

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