भोपाल, 7 अप्रैल, रेल प्र. भोपाल रेल मण्डल में इन दिनों ठेकेदारों का वर्चस्व इतना बढ़ गया है कि रेल प्रशासन उनके सामने अपने आपको कमजोर समझने लगी है, जिसके परिणाम स्वरूप ठेकेदारों का दबदबा बढ़ गया है.  सूत्रों की मानें तो मण्डल रेल प्रबंधक द्वारा रेल कर्मचारियों बाक्स ब्वाय के संपूर्ण केडर जिसमें 86 लोको एवं 22 ट्रेफिक के पदों को सरेन्डर करने का कार्य किया गया है.

भारतीय रेलवे में यह अपने आपमें अनूठा कार्य है कि जिस कैडर में सभी पद भरे हुए थे, ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस कार्य को अंजाम दिया गया है. पश्चिम मध्य रेलवे के महाप्रबंधक ने इस काम में अपनी अह्म भूमिका निभाई है. इस कार्यवारई से मण्डल के रेल कर्मचारियों में भय व्याप्त है कि रेलवे किसी भी केडर जिसमें पूरे लोग कार्यरत हों, उसे भी ठेकेदारी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कभी भी समाप्त कर सकता है. ठेकेदारी में मजदूर संगठन भी पीछे नहीं- इतने ज्वलंतशील मुद्दे पर दोनों मान्यता प्राप्त मजदूर संगठनों द्वारा चुप्पी साध रर्खी है. इनकी चुप्पी इस बात का प्रतीत है कि कहीं न कहीं से इनका भी मौन समर्थन प्राप्त है. एक मान्यता प्राप्त यूनियन ने अपने अध्यक्ष को ठेका मजदूर यूनियन का महामंत्री बनाने का कार्य किया है तथा एक मजदूर यूनियन के मण्डल सचिव के रिश्तेदार जगह-जगह रेलवे में ठेका लेने का कार्य कर रहे हैं.

फिर ठेकेदारी का विरोध क्यों
खुलेआम तौर से मान्यता प्राप्त दोनों यूनियनों द्वारा रेल प्रशासन के समक्ष ठेकेदारी के खिलाफ धरना, प्रदर्शन करने का कार्य किया जाता हैं. किन्तु यह नहीं देखा जाता कि उनके द्वारा किये जा रहे इस प्रकार के कृत्य का असर यूनियन से जुड़े हजारों रेल कर्मचारियों पर कितना प्रभावशील होगा. अपने स्वार्थ सिद्ध करने के चक्कर में दोनों यूनियनें अपने मूल कत्र्तव्य के मार्ग से भटकती नजर आ रही है जिसके चलते ठेकेदारी का रेल प्रशासन पर वर्चस्व बढ़ता ही जा रहा है.

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