विभिन्न स्तरों के ‘बंद’ आयोजित करना देश में राजनैतिक विरोध आंदोलनों की एक सामान्य प्रक्रिया बन चुका है. लेकिन इससे अब देश में बड़ी असामान्य स्थितियां निर्मित होने लगी हैं. सभी राजनैतिक पार्टियां व अन्य आंदोलन व संगठन भी इसका प्रयोग करने लगे हैं.

अब इस समय यह हालत हो गई है कि यह चलन देश में उसी तरह राजनीति कुरीति बन गया है, जैसे सामाजिक स्तर पर दहेज, भ्रूण हत्या और प्रशासनिक स्तर पर रिश्वतखोरी की कुरीतियों से समाज त्रस्त है. अब देश का आम जीवन इन राजनैतिक ‘बंद’ से भी त्रस्त हो चुका है. आम नागरिक के मूल अधिकार- आवागमन, व्यापार करने की स्वतंत्रता है और इन ‘बंद’ से राजनैतिक दल इसका सामूहिक हनन करते हैं. यदि रेल संचालन व सड़क यातायात बंद होता है तो सामूहिक रूप से लोगों की आवागमन की स्वतंत्रता का हनन होता है. दुकानें व अन्य प्रतिष्ठïन बंद कराने से लोगों की व्यापार करने की स्वतंत्रता का हनन होजाता है.

जनहित याचिकाओं पर कई बार हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने ‘बंद’ को गैर कानूनी माना है और सरकारों से इस राजनैतिक कुरीति को खत्म करने को कहा है. एक समय बाम्बे हाईकोर्ट ने मुम्बई  बंद आयोजित करने पर भारतीय जनता पार्टी व शिवसेना पर 20-20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था. कुछ समय पूर्व मध्यप्रदेश में इस समय सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी ने यह सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे ‘बंद’ की राजनीति राज्य में नहीं करेगी. लेकिन इस समय डीजल, रसोई गैस, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर जो भारत बंद हुआ वह मध्यप्रदेश में भी किया गया और उसकी आयोजक भारतीय जनता पार्टी ही है क्योंकि यह केंद्र की यूपीए सरकार के विरुद्ध है.

इस भारत बंद में रेलें भी बाधित हुईं और सड़क यातायात व दुकानें व अन्य प्रतिष्ठïान बंद कराये गये. जन जीवन को अस्त-व्यस्त करना, लोगों को परेशानी होना ‘बंद’ की सफलता का पैमाना हो गया है. गांधी के देश में सत्याग्रह ‘सत्य पर आग्रह’ नहीं रह गया वह ‘दुराग्रह’ हो चुका है. लिहाजा उनमें गांधी की अहिंसा नहीं बल्कि राजनैतिक गुंडागिरी की हिंसा तोडफ़ोड़ व आगजनी भी आ गयी है. इन हिंसक घटनाओं से समाज व जनजीवन में आतंक फैलता है, लोग भयभीत होते हैं,उन्हें हमलों, पत्थरबाजी में चोट लगती है, आगजनी से उनकी दुकान व आवासों को नुकसान होता है. राजनैतिक दलों का जनता व राजनैतिक जीवन में यह कर्तव्य हो जाता है कि वे हाईकोर्टों व सुप्रीम कोर्ट के फैसलों व निर्देशों का सम्मान करते हुए देश के राजनैतिक जीवन से ‘बंद’ की कुरीति को समाप्त कर दें. पार्टियों का यह कृत्य भी ‘आतंकवाद’ ही है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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