भारत सरकार ने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को प्रत्यक्ष स्वीकृति दे दी लेकिन आंतरिक निवेश को प्रत्यक्ष प्रोत्साहन न देकर अप्रत्यक्ष रूप से कुछ उम्मीदों के साथ कुछ ही राहत पहुंचाई है. अमेरिका व यूरो समुदाय के राष्ट्रों के बैंकों ने बाजार में पूंजी झौंक दी है और उसका प्रभाव भारत के पूंजी बाजार में दिखेगा. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के जरिये भारत में डालर व यूरो मुद्राओं में निवेश बढ़ेगा.

वही दूसरी ओर भारत सरकार के रिजर्व बैंक ने भारतीय निवेशकों के लिये बैंक दरों-रेपो व रिवर्स रेपो दरों को अभी जैसा का तैसा 8 और 7 प्रतिशत रखा है. केवल सी.आर.आर. को वर्तमान 4.7 प्रतिशत से 0.25 बैसिक पाइंट की कमी की है. इससे बैकिंग सेक्टर में 17,000 करोड़ रुपयों की वृद्धि हो जाएगी, जिसे वे ऋणों के जरिये औद्योगिक व व्यापारिक क्षेत्रों को दे सकेंगे. साथ ही सरकार की यह अपेक्षा है कि बैंकों को अब रिजर्व बैंक के पास बिना ब्याज की कम पूंजी रखने में निजी व सार्वजनिक बैंकों में प्रतिस्पर्धा से बैंक दरें कम हो जायेगी. प्रतिस्पर्धा की बात ऐसी नहीं है जो एकदम से हो जाए या बैंक ऐसा करेंगे. यह अनिश्चित भावना उद्योग व्यापार को प्रत्यक्ष रूप से कोई राहत की कल्पना नहीं है. भारतीय स्टेट बैंक के अध्यक्ष श्री प्रतीक चौधरी ने तो यह तक सुझाव दिया था कि सी.आर.आर. बैंकों पर अनावश्यक बिना ब्याज का पंूजी अवधान है. इसे पूरी तौर पर खत्म किया जाना चाहिए.

रिजर्व बैंक की वही घिसी पिटी दलील है कि महंगाई की दर अभी इतनी कम नहीं हुई है कि बैंकों की ब्याज दरें कम की जाए. रिजर्व बैंक कोई संवैधानिक स्वायत्त संस्था नहीं है. बल्कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय का विभागीय अंग है. इसलिये दोनों के फैसले शासकीय निर्णय ही है. सरकार की नीति इस समय सब्सिडी में कमी लाकर वित्तीय घाटे को 5.1 प्रतिशत लाना है. इस समय औद्योगिक क्षेत्र में बहुत ही मामूली एक प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. सरकार का यह अनुमान तो स्थिति के अनुकूल है कि विदेशी प्रत्यक्ष निवेश से देश में डालर व यूरो मुद्राओं के बढऩे से रुपया और मजबूत होगा. इससे मूल्यों में स्थाईत्व आने से भारत के निर्यात व्यापार में तेजी आ सकती है. अभी रुपए की अस्थिरता ने भारत के निर्यात व्यापार पर विपरीत प्रभाव डाला था और आयात काफी महंगा हो गया है. इसका सबसे ज्यादा असर पेट्रोल डीजल व अन्य पेट्रो पदार्थों के आयात पर भी पड़ा था. इन तमाम आर्थिक उलट फेर व सुधारों के कथित दौर में यह बात अब भी पूरी नदारद ही है कि सरकार मूल्य वृद्धि व मुद्रा स्फीति को कम करने के लिये क्या कर रही है. इस मोर्चे पर कुछ भी नजर नहीं आ रहा है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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