विकास दर और ब्याज दर पर मुद्रास्फीति इस हद तक हावी हो गई है कि रिजर्व बैंक ब्याज दरों को कम नहीं करेगा और देश में औद्योगिक व्यापारिक विकास दर नहीं बढ़ पायेगी. इसका हल्ला ज्यादा होता है कि उद्योगों का कार्य ठीक नहीं रहा, विनिर्माण में कमी आ गई. स्थिति बड़ी निराशाजनक है. इसमें यह बात दब जाती है कि बैंकों की ब्याज दरें ज्यादा रहने से पंूजी महंगी हो गई है और औद्योगिक उत्पादन की लागत बढ़ गई. वस्तुओं के महंगे होने से मांग भी कम हो गई.

अमेरिका और यूरोप के विकसित राष्टï्रों की अर्थ व्यवस्था की सबसे बड़ी खूबी यही है कि औद्योगिक क्षेत्र के लिये पंूजी पर ब्याज न्यूनतम स्तर 2-3 प्रतिशत रहता है. इसका सर्वांगीय लाभ यह होता है कि वे दुनिया के बाजार में गुणवत्ता व आपूर्ति तथा सबसे अच्छा व सस्ते होने के कारण छा जाते हैं. इसको क्या कहा जाये कि जापान छत्तीसगढ़ की बेलाडीला खदानों से लौह अयस्क ढोकर आंध्र के विशाखापट्टनम बंदरगाह तक ले जाता है और वहां से पानी के जहाजों में जापान ले जाता है. वहां जिस लागत पर स्टील बना लेता है. वह उसे भारत में निर्मित स्टील के रूप में लाकर यहां बनी स्टील से सस्ती बेच सकता है.

निश्चित ही स्टील बनाने की उच्चतम तकनीक व सुलभ पूंजी का कमाल है.यदि विश्व बाजार में निर्यात करना और विदेशी मुद्रा कमाना है तो दुनिया में हो रही प्रगति के साथ कदम मिलाकर चलने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है. दुनिया की इकोनोमी में ‘चलो या हट जाओÓ की स्थिति बन चुकी है. इसी बढ़ती मुद्रा स्फीति के नाम पर इसे ही नियंत्रित करने के लिये कुछ थोड़े समय पूर्व ही रिजर्व बैंक ब्याज दरों को लगातार 13 बार तक बढ़ाता ही चला गया. नतीजा यह हुआ कि विकास दर रिकार्ड गिरावट पर आ गई. निर्मित वस्तुओं का उत्पादन घट गया.

औद्योगिक क्षमता निम्न स्तर पर आ गई और मुद्रा स्फीति कम भी नहीं हुई. स्थिति यह हो गई कि ”न इधर के रहे न उधर के रहे”. इसके बाद ही रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों को कम किया तो उससे यह आशा बनी कि अभी तक तो ब्याज दरें बढ़ती गई थी अब उसी तरह नीचे भी लगातार होती जायेगी. लेकिन रिजर्व बैंक की फिर ”वही रफ्तार बेढंगी” हो गई. अब फिर वही पुराना फार्मूला कुछ नये ढंग से पेश किया जा रहा है. पहले बढ़ते मूल्यों की वजह से मुद्रा स्फीति के नाम पर ब्याज दरें बढ़ाई. अब यह कहा जा रहा है कि मूल्य और मुद्रा स्फीति बराबर बढ़ रहे हैं इसलिए ब्याज दरों को कम न करके वर्तमान स्थिति पर कायम रखा जायेगा.
लेकिन रिजर्व बैंक व सरकार दोनों में से कोई भी यह फार्मूला नहीं बता रहा कि मूल्य और मुद्रास्फीति को कौन रोकेगा कब रोकेगा और कैसे रोकेगा, जीवन की हर आर्थिक गतिविधि पर सर्विस टैक्स 10 से बढ़कर 12 प्रतिशत कर दिया. इनकम टैक्स, वेट टैक्स चल ही रहे है. अब सर्विस टैक्स को अष्टïभुजा वाला आक्टोपस बना दिया. आम आदमी जानना चाहता है कि मुद्रा स्फीति कब और कैसे रोकी जायेगी.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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