• नर्मदा जयंती पर विशेष

भरुच से लेकर जबलपुर तक राज करते थे खतरनाक डायनासौर, कुछ अलग थी करोड़ों साल पहले की दुनिया

इन्दौर, 29 जनवरी. नर्मदा घाटी धरती की प्राचीनतम नदी घाटियों में से एक है. यहां करोड़ों वर्ष पहले की दुनिया आज की दुनिया से बहुत भिन्न थी. यह तब की बात है, जबकि हिमालय पर्वत का निर्माण भी नहीं हुआ था, लेकिन विंध्य और सतपुड़ा पर्वत मौजूद थे. उस समय अरबसागर नेमावर के आसपास तक एक पतली शाखा के रूप में भीतर घुसा हुआ था. तब यहां समुद्री जीव-जंतुओं की भरमार हुआ करती थी.

उस काल में यहां छोटे-बड़े असंख्य डायनासोर भी विचरण किया करते थे और गगनचुम्बी वृक्षों से भरे हुए जंगल अभेद्य थे. फिर धीरे-धीरे करोड़ों बरसों में जलवायु और जैव विविधता में हुए अनेक बदलावों के कारण नर्मदा घाटी ने अपना आज का स्परूप ग्रहण किया. यहाँ के जीव-जंतु बदले, वनस्पतियां बदलीं और अंतत: मानव का विकास हुआ. नर्मदा के सुदूर अतीत के रहस्यों का यह पिटारा हाल ही में प्रकाशित एक नए ग्रंथ – ‘प्रकृति के रहस्य खोलते नर्मदा घाटी के जीवाश्म’ से हुआ है. इसे इन्दौर के स्वयंसेवी संगठन नर्मदा संरक्षण पहल ने तैयार किया है.

नर्मदा घाटी में कभी महागज- स्टेगोडॉन, शुतुरमुर्ग, हिप्पोपोटेमस आदि जीव रहा करते थे, जो आज भारत में ही नहीं पाए जाते हैं. इसी प्रकार नीलगिरी या यूकेलिप्टस का वृक्ष जिसे हम ऑस्ट्रेलिया से आया विदेशी वृक्ष समझते हैं, लाखों वर्ष पहले डिंडोरी (मंडला) के निकट घुघुवा में पाया जाता था. जबलपुर में डायनासोर का पहला जीवाश्म तभी खोजा जा चुका था, जब डायनासोर शब्द प्रचलन में भी नहीं था. धार जिले में बाग के निकट पाडल्या वनग्राम में डायनासोर के 100 से अधिक अण्डों के जीवाश्म हाल ही मिले हैं. वैज्ञानिक बताते हैं कि स्टीवन स्पिलबर्ग की प्रसिद्ध फि ल्म जूरासिक पार्क में दिखाए गए भयानक टी-रेक्स डायनासोर जैसा मांसाहारी विध्वंसक डायनासोर कभी भरूच से लेकर जबलपुर तक एकछत्र राज किया करता था. वैज्ञानिकों ने इसे नर्मदा घाटी का राजसी डायनासोर कहते हुए इसका नाम राजासॉरस नर्मदेन्सिस किया है. सीहोर जिले के नर्मदा तटीय गाँव हथनौरा में लगभग पाँच लाख साल पुराने नर्मदा मानव का जीवाश्म मिलना मोहन जोदड़ो और हड़प्पा की खोज से भी अधिक महत्वपूर्ण है.

Related Posts: