भारत की अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था ‘इसरो’ ने सितम्बर 9 को सुबह 9 बजकर 53 मिनिट पर 100वां उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़कर वैज्ञानिक क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित कर लिया. इसने पी.एल.एस.वी.-सी-21 प्रणाली से फ्रान्स और जापान के दो छोटे… उपग्रह अंतरिक्ष में 655 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित कर दिये. यह भी एक संयोग है कि भारत का पहला उपग्रह फ्रान्स ने अंतरिक्ष में छोड़ा था. आज हम इतने विकसित हो गये हैं कि हमने फ्रान्स का उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किया. पी.एल.एस.वी. छोटे उपग्रहों को छोडऩे की प्रणाली है.

अब कई और देश भी अंतरिक्ष विज्ञान में आ रहे हैं. उनके उपग्रह छोटे आकार के होंगे. उन्हें छोडऩे के लिये भारत की अंतरिक्ष प्रणाली व्यवसायिक तौर पर ठीक रहेगी. बड़े अंतरिक्ष यानों को छोडऩे की प्रणाली जी.ए.एस.वी. होती है. भारत का इसरो इसको भी तेजी से विकसित कर रहा है. इसरो का अंतरिक्ष सफर 1975 से शुरु हुआ है. इन 37 सालों में कई असफलताओं के बीच से गुजरता हुआ आज इसरो विज्ञान अंतरिक्ष अनुसंधान में विश्व के अग्रणी राज्यों में से एक हो गया है. अब अगले 10 सालों में इस प्रगति की रफ्तार इतनी तेज होती जा रही है हम अगले दशक में इसरो के चन्द्रयान-2 और मंगल ग्रह अभियान को अंतरिक्ष में जाते देखेंगे.

विज्ञान की प्रगति का यह विश्वव्यापी और सम्पूर्ण मानवता के लिये अभियान जारी है. इस प्रगति में भारत का इसरो भी तेजी से चल रहा है. हमें क्रयोजेनिक इंजिन की टेक्नोलोजी दूसरे देशों ने नहीं दी. अपने काम के लिये हमने 2 क्रायोजेनिक इंजन रूस से प्राप्त किये थे. उस समय अमेरिका ने इसका विरोध करते हुए रूस से कहा था कि वह भारत में यह इंजिन या तकनीक न दे. प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी के शासन काल में पोखरण में परमाणु परीक्षण के बाद विदेशी सरकारों व उनके वैज्ञानिक संस्थानों ने भारत से कुछ दूरी कर ली थी. इसका एक लाभ यह हुआ कि हमने खुद ही क्रायोजेनिक इंजिनों के लिये स्वदेशी तकनीक विकसित कर ली. आज दुनिया के उन्नत वैज्ञानिक देशों ने हमसे फिर करीबी संबंध बनाया है. उसी कड़ी में आज के ये दो लांच है जो फ्रांस व जापान के है.

अब भारत का इसरो केवल वैज्ञानिक स्वरूप का नहीं रहा. उसका व्यापारिक स्वरूप ”एन्ट्रिक्स” है. जो व्यापारिक अनुबंधों में दूसरे देशों के यान अंतरिक्ष में छोड़ता है. सभी देशों को अंतरिक्ष कार्यक्रमों में कभी-कभी जो असफलताएं मिली है उसमें एक अमेरिकी असफलता सबसे बड़ी रही. उसका एक मानव अंतरिक्ष यान अपोलो अंतरिक्ष में ही नष्टï हो गया. उसमें एक भारतीय मूल की वैज्ञानिक कल्पना चावला भी मारी गई. आज एक भारतीय मूल की वैज्ञानिक सुनीता विलियम्स भी इन दिनों अंतरिक्ष में हैं जिसने इसी 15 अगस्त को अंतरिक्ष पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया था. 9 सितंबर को जब  ये 100वां अंतरिक्ष यान छोड़ा गया उस समय भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह विशेष रूप से वहां उपस्थित थे.

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