इस मानसून में वर्षा का क्रम अस्त-व्यस्त रूप से चलता रहा. उसमें खरीफ फसलों का क्रम भी गड़बड़ा गया. कहीं कम वर्षा में कर्नाटक व पश्चिम महाराष्टï्र में कृषि फसलों का उत्पादन गिर गया, वहीं कई राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र में अति वर्षा से बाढ़ की स्थिति नदियों के अलावा खेतों में जल भराव की भी बनती रही. इससे भी फसलों को नुकसान हुआ. मध्य प्रदेश में सोयाबीन की बुआई में वर्षा की देरी का विपरीत प्रभाव पड़ा, वहीं बाद में अति वर्षा से भी सोयाबीन को नुकसान हुआ.

खेती के धंधे में मौसम की ऐसी परेशानियां होती ही रहती हैं और उसे समायोजित कर भी लिया जाता है. दु:खद स्थिति वह होती है कि कभी वर्षा न हो सूखे की स्थिति और अकाल की स्थिति निर्मित हो जाये, उस साल भी स्थिति दिक्कत की होती है, लेकिन सम्हाल ली जाती है. इस वर्ष भी वर्षा क्रम में उलट फेर से खरीद के उत्पादन में 10 प्रतिशत कमी हो जाने का आंकलन है. इसे इस ढंग से कहना ज्यादा वास्तविक होगा कि इस साल गड़बड़ मानसून के बाद भी 90 प्रतिशत खरीफ फसल आ रही है, जो कमी से कहीं बहुत ज्यादा उपलब्धि है. लेकिन कृषि मंत्री श्री शरद पवार अपनी आदत से भी मजबूर हैं कि वह ऐसी जरा सी कमी को भी बढ़ा-चढ़ा कर ऐसा बोलते हैं कि उन खाद्यान्नों के भाव चढ़ जाते हैं. हाल के वर्षों में जो भावों में लगातार तेजी आई है उसका कारण उत्पादन व मौसम नहीं बल्कि श्री शरद पवार के बयान ही थे. श्री पवार व प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार श्री रंगराजन इस 10 प्रतिशत की संभावित कमी से संभावित मूल्य वृद्घि का इशारा कर रहे हैं.

श्री पवार यह भी मान रहे हैं कि देर से आई बरसात ने खरीफ पैदावार को बेहतर कर दिया है और पिछले पांच वर्षों की तुलना से अधिक 11 करोड़ 80 हजार टन खाद्यान्न उत्पादन की संभावना है. धान उत्पादन में वृद्धि हो रही है और इस वर्ष बढ़कर 8 करोड़ 55 लाख 90 हजार टन होने की उम्मीद है. दालों के उत्पादन में 52.6 लाख टन होने का अनुमान है जो अनुमान से साढ़े चार लाख टन कम है. तिलहनों का उत्पादन बढ़कर एक करोड़ 87 लाख 80 हजार टन होने का आंकलन हो गया है. इसमें यह विविधता रहेगी कि सोयाबीन का तो रिकार्ड उत्पादन होगा जो पहले से बढ़कर एक करोड़ 26 लाख 20 हजार टन होगा. लेकिन मूंगफली कुछ कम उत्पादन में 6 लाख 10 हजार टन रहेगी. केंद्र सरकार की यह नीति है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में मलेशिया से आयात किया गया पाम खाद्य तेल दिया जाता है और मध्यम व उच्च वर्ग मूंगफली तेल का इस्तेमाल करता है.

इसमें संतुलन कर सोयाबीन तेल की खपत बढ़ाई जाए, जो पाम खाद्य तेल से ज्यादा पौष्टिïक और मूंगफली तेल से सस्ता होता है. कभी सामान्य रूप से तिल्ली का तेल ही खाद्य तेल होता था जो अब मूंगफली हो गया है. भारत का अगला खाद्य तेल सोयाबीन तेल होगा. इसकी खेती व उत्पादन दिनों दिन बढ़ती जा रही है और सोया ऑइल प्लांट भी काफी लगते ही जा रहे हैं. मध्यप्रदेश काफी समय पहले से ही सोयाबीन के उत्पादन में भारत का प्रथम राज्य बना हुआ है. अन्यथा खाने के सभी तेलों में सरसों का तेल सर्वश्रेष्ठï माना जाता है लेकिन वह अब अचार का तेल बनके रह गया है.
यह भी एक बहुत सुखद समाचार है कि इस खरीफ मौसम में गन्ने का उत्पादन भी एक करोड़ 2 लाख 20 हजार टन से बढ़कर 33 करोड़ 53 लाख 30 हजार टन होने का अनुमान है. शक्कर तो खूब ही होगी सस्ती भी रहनी चाहिए बशर्ते सरकार उसका निर्यात न कर डाले. इस साल कपास व जूट का उत्पादन भी अधिक आ रहा है. देश में कपड़ा सस्ता रहना चाहिए.  इस साल अनाज भंडारण में बोरों की कमी आई थी लेकिन जूट की पैदावार बढऩे से वह कमी भी नहीं होनी चाहिए.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

Related Posts: