मच्छर की मार

मच्छर की मार भारत को बहुत ही भारी पड़ रही है. संयुक्त राष्ट्र के विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) के अनुसार दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में मलेरिया के कुल मामलों में से 73 प्रतिशत मामले भारत में होते हैं और बीमारियों से मौतों में 28 प्रतिशत मौत मलेरिया से होती है. यह मच्छर अपरास्त बना हुआ है और हम इससे परास्त होते जा रहे हैं. हमारी हर दवाई और प्रयास इसके सामने असफल हो गये हैं. हम आपसी व्यवहार में जब भी किसी व्यक्ति या वस्तु को बहुत ही तुच्छ व कमजोर कहना चाहते हैं तो उसके लिए ‘मच्छर’ शब्द का प्रयोग करते हैं, लेकिन हमारे राष्ट्रीय जीवन विज्ञान व उपचार में यह सबसे ‘शक्तिशाली’ है जिसे हम हर कोशिश के बाद भी मार नहीं पा रहे हैं, बल्कि यही हर साल दुनिया सहित भारत में भी लाखों लोगों को अपनी मार से मार डालता है.

चिकित्सा अनुसंधान व शोध के क्षेत्र में इसके विनाश के लिये कई शक्तिशाली दवाईयां ईजाद की गईं, लेकिन एक समय बाद से यह अति सूक्ष्म प्राणी उससे अपनी प्रतिरोधक शक्ति का विकास कर उस दवाई को ही शक्तिहीन कर देता है. ऐसा लगता है कि वह दवाई ही मलेरिया से मर गई. मच्छर की चार प्रजातियां पी. फेल्सीफेरम, पी. मैलेरिये, पी. ओवेल और पी. विवेक्स है. इनमें मलेरिया, फायलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया जैसी मच्छर से फैलने वाली बीमारियां होती हैं. इसमें सबसे ज्यादा पी. फेल्सीफेरम है. दुनिया की 3.3 बिलियन आबादी को मलेरिया का खतरा रहता है, इसमें 85 प्रतिशत बीमारी पी. फेल्सीफेरम से होती है. भारत में परम्परागत कुनैन व कड़वा चिरायता के अलावा मलेरिया के लिये ऐलोपैथी चिकित्सा विज्ञान ने क्लेरो क्वीन, आर्टमिस्टिनन, सल्फाडोक्साइन, प्यूरीमिथाइन मेफ्रोक्यूइन शक्तिशाली मलेरिया उन्मूलक दवाईयां बनाई लेकिन मच्छर इनसे भी प्रतिरोधी हो गया.

भारत में ऋतु परिवर्तन जब सर्दी, गर्मी व बरसात का एक मौसम जाता है और दूसरा आता है उस मौसम के संधिकाल में मच्छर का प्रकोप सर्वाधिक रहता है. लेकिन बहुत ही छोटे रूप में साल भर चलता जरूर रहता है. भारत में गंदगी बहुत है. आबादी भी बहुत ज्यादा है. हर जगह गंदी नालियां रहती है और मच्छर पनपने का क्रम भी चलता रहता है. डेंगू का मच्छर तो साफ पानी में फैलता है और दिन में काटता है. व्यवहार से अब यह भी जान लेना चाहिए कि मच्छर बुद्धिमान भी होता है और अपना बचाव व प्रतिरोधी शक्ति पैदा कर लेता है. धुएं की क्वाइल या टेबलेट जलाने से यह उसकी सीमा से बाहर चला जाता है. छत पर जाकर चिपक जाता है.  फ्लिट की मार से बेहोश हो जाता है और कुछ ही देर में फिर उड़ जाता है. एक ऐसी मछली है जो पानी में इसका लार्वा खा जाती है और इसे बढऩे नहीं देती. लेकिन वह मछली नाली नालों के गंदे पानी में काम की नहीं रहती. उसमें वह खुद मर जाती है. दुनिया के सामने स्वास्थ्य की सबसे बड़ी समस्या मलेरिया है. इसकी रोकथाम के लिये कई दवाईयां विकसित हुई है. लेकिन यह लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं. भारत में इसका सबसे कारगार उपाय यही हो सकता है कि गंदगी और कचरे का ही सफाया लगातार होता रहे. नाली-नाले में फिनाइल जैसी सस्ती सुलभ चीजें भी डाली जाती रहनी चाहिए.  बात घूम फिर कर वही आ जाती है कि देश में गरीबी से बड़ी गरीबी अशिक्षा की है. इन दोनों को मिटाने से ही जीवन स्तर को समझने व सुधारने से इसके साथ कई अन्य समस्याओं का भी निराकरण हो सकेगा.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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