नई दिल्ली,18 मार्च. आगामी लोकसभा चुनाव से पहले बिहार शताब्दी उत्सव के बहाने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दिल्ली में मजबूत आगाज किया. उन्होंने यह कहकर साफ कर दिया कि बिहार के बिना अब दिल्ली का काम नहीं चलने वाला. मुख्यमंत्री ने कहा, ‘दिल्ली पर हमारा भी उतना ही हक है, जितना अन्य किसी का.’

बिहार के सौ साल पूरे होने पर दिल्ली स्थित बुरारी के संत निरंकारी मैदान में आयोजित समारोह में नीतीश ने यहां रहने वाले बिहारियों का स्वाभिमान भी जगाया. कहने को तो यह भाजपा एमएलसी संजय झा के नेतृत्व में आयोजित एक गैर राजनीतिक समारोह था, पर मकसद नीतीश की राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराना था. यही वजह थी कि कार्यक्रम के संयोजक भले ही भाजपा एमएलसी रहे हो पर इसमें भाजपा के छुटभैया नेता भी शामिल नहीं थे. कार्यक्रम की तैयारी में नीतीश के भरोसेमंद सांसद आरसीपी सिंह के नेतृत्व में जदयू एमएलसी नीरज कुमार व पार्टी के दर्जनों कार्यकर्ताओं की टीम महीने भर से लगी थी. आयोजकों ने आयोजन कुछ इस तरह से किया था कि जदयू का भी कोई दूसरा नेता इसका श्रेय नहीं बटोर सका.  अध्यक्ष शरद यादव, संसदीय दल के नेता रामसुंदर दास, राष्ट्रीय प्रवक्ता शिवानंद तिवारी की कौन कहे, दल के सांसद या बिहार के किसी मंत्री को भी आमंत्रित नहीं किया गया था.

इसके बावजूद कौशलेंद्र कुमार, विश्वमोहन कुमार और हरि मांझी जैसे कुछेक सांसद मौके पर पहुंच गए थे. बिहार से बाहर राजधानी दिल्ली में नीतीश का यह पहला सार्वजनिक कार्यक्रम था. इस लिहाज से उन्हें देखने व सुनने भीड़ भी जुटी. मुख्यमंत्री ने जब कहा कि बिहार के लोग बाहर जाकर भीख नहीं मांगते. मेहनत, मेधा और कौशल के बल पर अपने लिए जगह बनाते हैं, तो लोगों ने तालियां बजाकर समर्थन भी किया. मुख्यमंत्री नीतीश ने कहा कि बिहार का इतिहास सौ साल नहीं, बल्कि हजारों साल का है. इसका इतिहास देश का इतिहास है. किसी कारण से हम नीचे आ गए थे. कालचक्र का पहिया अब घूम गया है. एक बार फिर बिहार आगे आ रहा है. उन्होंने कहा कि बिहार व्यापार के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान के लिए दुनिया में जाना जाता रहा है.

इसके साथ ही नीतीश ने एक तरह से चेता भी दिया कि दिल्ली में जिस तेजी से बिहारियों की संख्या बढ़ी है, अगर एक दिन ये लोग काम बंद कर दें तो दिल्ली ठहर जाएगी. इसका मतलब यह नहीं कि आप काम बंद कर दें. पर दिल्ली को भी हमारा हक देना होगा. बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग हम करते रहेंगे. लेकिन हाथ पर हाथ धरकर बैठे भी नहीं रहेंगे.

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