भारत खाद्यान्न गेहूं, चावल, चना, मोटा अनाज, ज्वार, मक्का आदि में संपन्नता की स्थिति में कभी का आ चुका है. समर्थन मूल्य से और उसके बाद खुली मंडियों व बाजारों में बम्पर फसलों से माल उफन पड़ता है. हम इस स्थिति में हैं कि गेहूं व चावल का निर्यात भी करते रहते हैं. क्रेश क्रॉप में गन्ना भी भरपूर आ रहा है. इससे हमारा शक्कर उत्पादन व खपत लगभग बराबर के चलती है. भारत दुनिया में शक्कर उत्पादन में ब्राजील के बाद सबसे बड़ा देश है लेकिन शक्कर की खपत के मामले में हम दुनिया के सबसे बड़े देश हैं.

लेकिन कभी-कभी उत्पादन खपत से थोड़ा ज्यादा हो जाता है और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में शक्कर की कीमतों में बहुत वृद्धि हो जाने से हम विदेशी मुद्रा अर्जित करने के लिए शक्कर का निर्यात भी करते रहते हैं. प्याज में हमारा देश दो रूप में है यहां प्याज की पैदावार भी बहुत है और खपत भी बहुत है. हम अच्छी फसल होने पर इसका निर्यात भी कर लेते हैं और फसल बिगड़ जाए तो इसका आयात भी करना पड़ता है. अब तो प्याज का राजनैतिक महत्व हो गया है. यदि इसकी कमी हो जाए तो जनता के साथ साथ सरकार भी संकट में आ जाती है. ऐसा माना जाता है कि एक बार केंद्र सरकार में सत्तारुढ़ दल एनडीए इसलिए भी हार गया कि वह प्याज की कीमतें बढऩे से रोक नहीं सका और न ही समय पर उसका आयात हो पाया.

कपास के मामले में हमने आकाश छू लिया. कुछ समय पहले तक हम कपास का आयात करते थे लेकिन बी.टी. (बायो टेक) कपास से खेती के कारण भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश पिछले 10 सालों में बन गया. इसकी खेती से जहां भारत का कपास उत्पादन 9.25 प्रतिशत बढ़ गया वहीं किसानों की आय में 375 प्रतिशत इजाïफा हुआ. भारत चीन को सबसे ज्यादा निर्यात और चीन हमसे सबसे ज्यादा कपास का आयात करता है. कभी भारत से कम मिलने पर चीन को अमेरिका से कपास आयात करना पड़ती है, जो उसे बहुत महंगी पड़ती है. चीन का टेक्सटाइल उद्योग भारत के कपास पर निर्भर है.

इस तरह हम अब इस संपन्नता के युग में आ गये हैं कि हम खाद्यान्न, शक्कर, कपास, प्याज में आत्मनिर्भर से ज्यादा हो गये हैं कि हम इनमें निर्यातक देश का दर्जा रखते है. लेकिन खाद्य तेल और दालों के मामले में हम दूसरों के मुहताज बने हुए हैं. भारत अपनी खाद्य तेलों की पूरी जरूरत का 50 प्रतिशत भाग दूसरे देशों से आयात करता है. पास के ही पूर्वी राष्टï्र मलेशिया से हम लगभग 20 लाख टन पॉम तेल का आयात करते हैं. उच्च एवं मध्यम वर्ग में तो मूंगफली व सोयाबीन का तेल ही खाया जाता है. लेकिन पाम आइल में सार्वजनिक वितरण प्रणाली व निम्न आय वर्ग का काम चलता है. तिलहन और दलहन में हमें अभी बहुत ज्यादा प्रयास करने चाहिए. खाद्य तेल और दालें भोजन का अनिवार्य अंग है. दालों में भी हमें 43 प्रतिशत दालें दूसरे देशों से मंगानी पड़ती है. इसमें अब एक अजीबोगरीब बात हो गई है. भारत के लोगों के लिये ”मटर” सब्जी है. लेकिन विदेशों में हम ”पीली मटर” आयात करके कहते है इसे खाइए- यह भी ”दाल” है. और ”बहुत पौष्टिïकÓÓ है. लेकिन अभी यह हमारी ”दालÓÓ बन नहीं पाई. भला हो सोयाबीन का जिसने भारत के लोगों को खाद्य तेलों में बड़ा सहारा दिया. अब भारत के किसान सोयाबीन की फसल और भारत के लोग सोया को खाद्य तेल के रूप में अपना चुके हैं.

मलेशिया चावल व गेहूं का काफी आयात करता है. चावल की जरूरत वह पड़ोसी राज्य म्यनमार, थाईलैंड,  लाओस व वियतनाम से कर लेता है और गेहूं ज्यादातर आस्ट्रेलिया से लेता है. मलेशिया में गेहूं की खपत तो  है पर वहां पैदा नहीं होता है. भारत के लिये यह हितकर होगा कि वह मलेशिया को गेहूं, चावल निर्यात करे और उससे पाम आइल और पेट्रो उत्पाद का वस्तु विनियम (बार्टर) के आधार पर आयात करे. इस दिशा में प्रयास एक बहुत सराहनीय कदम है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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