नाम और सरनेम का पहला अक्षर जब दूसरे शब्दों के साथ जुड़ा होता है तो वह बताता है कि व्यक्ति की पहचान खो गई है. उसे कोई नहीं जानता. वह भीड़ में खोया हुआ एक इंसान है जिसे हर कोई दबाने की कोशिश करता है. वह कुछ नहीं कर पाता. किसी फिल्म की शूटिंग के होने पर कैमरे का फोकस सिर्फ हीरो की तरफ होता है,बाकी सब भीड़ होती है
यदि नाम और सरनेम के पहले अक्षर को स्वतंत्र कर दें तो वह पहचान देने लग जाते हैं. उदाहरण के लिए अशोक का अ तथा शर्मा का श अक्षरों को बिना किसी अक्षर से जोड़कर लिखने लग जाने पर यह पहचान देने लग जाते हैं. पहली स्थिति के विपरीत लोग दबाने की जगह दबने लग जाते हैं. जिस व्यक्ति की पहचान होती है, उसे लोग आदर देते हैं.नाम का और सरनेम का पहला अक्षर कैपिटल यानी बड़ा होना चाहिए. यदि पहला अक्षर छोटा होगा तो वह अपनी आधी ही पहचान आगे भेजेगा. नाम के पहले अक्षर की कोई सीमा निर्घारित नहीं होती. आप उसे जितना बड़ा बनाएंगे उतनी ही बड़ी पहचान देगा. जितनी डिजाइनदार बनाएंगे व्यक्ति उतना ही कला अथवा व्यवसाय के क्षेत्र में कलाकार होता जाएगा. उदाहरण के लिए इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के हस्ताक्षरों का अध्यन करने पर पता चलता है कि उनके नाम का पहला अक्षर बाकी अक्षरों से पांच-छह: गुना बड़ा होता था. जो यह बताता है कि उनकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान कितनी बड़ी है. अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर के साइन में पहला अक्षर अन्य अक्षरों की अपेक्षा पांच-छह गुणा बड़ा साथ ही कलात्मक घुमाव को लिए हुए है जो उन्हें अपने क्षेत्र के प्रति समर्पित बताता है. विश्व के किसी भी बड़े नेता के हस्ताक्षर का पहला अक्षर अन्यों की तुलना में पांच-छह गुणा बड़ा तथा स्वतंत्र होता है, वहीं विश्व के किसी भी क्षेत्र के कलाकार का पहला अक्षर अन्य अक्षरों की तुलना में पांच छह गुणा बड़ा -साथ ही कलाकारी घुमाव-फिराव के साथ होगा.

