भारत के सभी प्रकार के आर्थिक राजनैतिक व सामाजिक विकास में दुर्दशा और पिछडऩे का एक बड़ा कारण यह है कि इस देश में किसी भी निर्णय या नतीजे तक पहुंचने में असाधारण विलंब हो जाता है या यह भी कहा जा सकता है कि किया जाता था. हमारी प्रशासनिक गतिविधियां मुहावरे की भाषा में कछुआ चाल होती है. पिछड़े अफ्रीका महाद्वीप का विकसित राष्ट्र ईजिप्ट (मिस्र) चाहता है कि भारत उसके देश सैन्य उद्योगों में पूंजी निवेश करे. मिस्र के नये राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी खुले बाजार की नीतियों को ला रहे हैं. वह चाहते हैं भारत उसके देश में व्यापारिक व औद्योगिक निवेश करे.

लेकिन उनका कहना है कि मिस्र का भारतीय निवेशकों के साथ अनुभव उत्साहवर्धक नहीं रहा. उनकी तरफ ढिलाई बहुत रहती है. जबकि चीन के साथ उनका अनुभव इसके विपरीत निर्णय और क्रियान्वयन में काफी फुर्तीला रहा. मिस्र और भारत प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के जमाने से काफी निकट है. पंडित नेहरू, मिस्र के राष्ट्रपति कर्नल नासिर और यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो ने मिलकर गुट निरपेक्ष आंदोलन को खड़ा किया और विश्व राजनीति में उनकी अहम भूमिका रही. शीत युद्ध के जमाने में दुनिया में शक्ति संतुलन बनाये रखने में इस संगठन जिसे “नाम” (नान ऐलाइंड मूवमेंट) के संबोधन से जाना जाता था, की महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी.

इस समय मिस्र के राष्ट्रपति श्री मुर्सी चीन के मुकाबले भारत को ही अपने देश में निवेशक के रूप में चाहते हैं. रक्षा उद्योगों में वे केवल भारत का निवेश चाहते है. यदि भारत अपनी शिथिलता से ऊपर उठकर मिस्र मे अपने उद्योगों को जमा लेता है तो वह आफ्रीका के पूरे राष्ट्रों में अपनी औद्योगिक व वित्तीय स्थिति जमा लेगा. भारत के लिये एक इतने बड़े महाद्वीप के आर्थिक द्वार मिस्र्र में अपनी साख, पूंजी व निवेश को जमा कर आसानी से प्राप्त की जा  सकती है.

हाल ही में टूनिशिया से प्रारंभ होकर पूरे अरब राष्ट्रों में विद्रोह व राजनैतिक उठा पटक का दौर चला. उसकी लपटों में मिस्र्र भी झुलस गया और राष्ट्रपति होस्नी मुबारक का तख्ता पलट गया. नई सरकारें यह चाहती है कि उनके देशों में अब आर्थिक विकास का दौर शुरू हो और वह भी अपने देश में विदेशी उद्योग व पून्जी विकास के लिए चाहता है. इसमें उसकी परम्परागत भारत-मिस्र की मैत्री भावना परिलक्षित हो रही है. वह चीन के मुकाबले भारतीय निवेश को ही पसन्द करेगा.

लगभग सभी अफ्रीकी व एशियाई देश हमेशा से यह चाहते हैं कि चीन के मुकाबले भारत से ही संबंध जोड़े जाएं. लेकिन भारत की इस क्षेत्र में लेटलतीफी और ढील हमारे अन्दरुनी विकास को तो बरबाद कर ही रही है, साथ ही विदेशों में उसकी साख भी नहीं बन पा रही है. इस समय अफ्रीकी व अरब देशों में लम्बे उथल-पुथल के बाद आर्थिक पुनर्रचना का दौर आया हुआ है. भारत को यह अवसर गंवाना नहीं चाहिए बल्कि पूरे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अफ्रीकी व्यापार-बाजार में अपने को जमा लेना चाहिए.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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