प्रयागराज (इलाहाबाद) का वर्ष 2013 का महाकुंभ कई अर्थों में सिरमौर रहा. हर साल की निश्चित तिथि 14 जनवरी को प्रारंभ होते ही पुरुषोत्तम (अतिरिक्त पौष) मास समाप्त हो गया. ज्योतिष गणना के अनुसार इस वर्ष मकर संक्रान्ति का आगमन दिन को 12 बजकर 55 मिनिट पर गजारुढ़ होकर हुआ है. इस वर्ष इनका वाहन गज (हाथी) रहेगा.

देश में चार कुंभ नगर नासिक (गोदावरी तट), इलाहाबाद (गंगा-यमुना-सरस्वती संगम), उज्जैन (क्षिप्रा तट) और हरिद्वार (गंगा तट) है. जहां 3-3 साल में कुंभ लगता है. एक स्थान पर कुंभ इस परिक्रमा की वजह से 12 साल बाद आता है. प्रयाग कुंभ 54 दिन तक चलेगा. जिसमें 6 स्नान पर्व है. आखरी स्नान 10 मार्च को महाशिवरात्रि को होगा और कुंभ का समापन होगा.

इस बार इसमें लगभग दो करोड़ श्रद्धालु आने की संभावना है. सभी 6 स्नानों में 10 फरवरी मौनी अमावस्या को सर्वाधिक लगभग 3 करोड़ लोग स्नान करेंगे. इस बार प्रयाग कुंभ में शंकराचार्यों का अनादर करना एक बहुत ही गलत बात हो गई. देश में हिन्दू धर्म का कोई बहुत ही सशक्त व चलायमान संगठनात्मक ताना-बाना काम नहीं कर रहा है. फिर भी जो कुछ मौजूद है उसमें देश के चारों शंकराचार्य श्रंगेरी (दक्षिण), द्वारका (पश्चिम), बद्री केदार (उत्तर) और पुरी (पूर्व) का अपना एक सम्माजनक स्थान है. इस कुंभ में उन्हें समोचित स्थान व मान सम्मान नहीं दिया गया है. खबर यह भी आई कि शंकराचार्य श्री श्री स्वरूपानंदजी वहां से चले आये.

कुंभ मेले संसार में सबसे बड़े धार्मिक आयोजन माने जाते हैं. इनको व्यवस्थित करने का दायित्व तीन राज्य सरकारों महाराष्ट, मध्यप्रदेश को एक-एक स्थान और उत्तर प्रदेश को दो स्थानों पर करने का आता है.
कुंभ का इतिहास भी प्राचीनतम है. समुद्र मंथन से निकले अमृत घट को इन 4 स्थानों पर रखा गया है. यहां अमृत बूंदे गिरी थीं. उसको ही पर्व के रूप में तब से अब तक मनाया जा रहा है. देश में चारों तरफ से कुंभ स्पेशल रेलगाडिय़ां इलाहाबाद के लिए चलाई जा  रही हैं.

ऐसे महाकुंभ के अवसर पर स्नान व तीर्थ भ्रमण में तो सर्वसाधारण लोग लगे रहते हैं लेकिन धर्माचारों को इस अवसर का लाभ उठाकर धर्म को संगठित और व्यवस्थित रूप देने के लिए प्रयास करना चाहिए. यूरोप में कभी ईसाई धर्म भी बिखरा अव्यवस्थित पड़ा था लेकिन बाद में रोमन कैथोलिकों ने पोप (वेटीकन) प्रथा से उसे संगठन व व्यवस्था का स्वरूप दे रखा है. आदि शंकराचार्य ने भी 4 पीठ स्थापित कर हिंदू धर्म को संगठित रूप देने का प्रयास किया था लेकिन बाद के शंकराचार्यों की इस बात के लिए आलोचना की जाती है कि उस प्रयास को आगे नहीं बढ़ा पाए. पूजा पाठ पुजारी की परंपरा में चले गए.

जब भारत पर यवनों, मुसलमानों के आक्रमण हुए- बड़ी संख्या में मंदिर ध्वस्त किए गए. उस समय के शंकराचार्य न तो धर्म को संगठित कर पाए और न ही मंदिरों की रक्षा कर पाये. हताश देखते रहे. अंग्रेजों के विरुद्ध आजादी की लड़ाई में भी शंकराचार्यों का कोई योगदान नहीं रहा.  आदि शंकराचार्य ने पूरे देश में अलख जगाया था और हिन्दू धर्म की अवनति को रोका था. वर्तमान शंकराचार्यों को आदि शंकराचार्य दिशादर्शन व उनके कदमों में चलना चाहिए. उन्हें इस बात का आभास होना चाहिए कि जिस देश में सीता हरण के लिए रावण का पुतला हर दशहरे को प्रतीक के रूप में जलाया जाता है उसी हिंदू समाज में बलात्कार भी हो रहे हैं. उनमें कोई सीता हरण की वेदना व रावण के प्रति तिरस्कार नजर नहीं आता.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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