भोपाल, 7 मई. समाज में होने वाली हर गतिविधि के पीछे आर्थिक कारण ही होते हैं. छुआछूत के बहाने ऋषि मनू की वर्ण व्यवस्था में वर्गभेद भी आर्थिक आधारों की विषमताओं को प्रतिपादित करता है.

जीटीबी कॉम्पलेक्स के तृतीय तल पर दि पोस्ट एंड टेलीग्राफ्स एम्पलाईज को-आपरेटिव क्रेडिट सोसायटी के कार्यालय में 5 मई की शाम चिंतक कार्ल माक्र्स के नाम रही. इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुये उपरोक्त विचार वरिष्ठ पत्रकार लज्जाशंकर हरदेनिया ने भारतीय समाज का कार्ल माक्र्स के विचारों के सापेक्ष तुलनात्मक टिप्पणी करते हुये व्रक्त किये. कार्यक्रम में कवि कुमार अंबुज एवं साहित्यकार का. गोविन्द सिंह असिवाल ने भी माक्र्स की विचारधारा पर विशेष प्रकाश डाला. कार्यक्रम का संचालन शैलेंद्र कुमार शैली द्वारा किया गया एवं संयोजन दिनेश नायर का था. इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हुकुमपाल सिंह विकल एवं आदि शक्ति के अध्यक्ष मोहन सिंह ठाकुर, आर.के. तोतरे, कर्मचारी नेता वी.पी. कुंभारे, एन.के. चौबे, यू.पी. कटारे, मानस भरद्वाज, राम कुकरेजा के साथ ही बड़ी संख्या में कर्मचारी व साहित्यकार उपस्थित थे.

अपने वक्तव्यों के दौरान शैलेंद्र शैली ने कहा कि माक्र्स का चिंतन वैज्ञानिक चिंतन है जो कि श्रमजगत में आज भी उतना ही प्रसांगिक है. वरिष्ठï कवि कुमार अंबुज ने कहा कि सम्पत्ति शब्द चोरी का प्रतीक है फिर चाहे वह श्रम की चोरी हो कानून का उल्लंघन कर कर की चोरी हो अथवा और किसी तरह से एकत्रित किया हुआ धन. माक्र्सवाद को वर्तमान में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. मजदूर वर्ग विभाजित हो गया है. विशेषकर कलम से श्रम करने वाला मध्यम वर्ग अपने आपको अपने निज स्वार्थों के चलते मजदूर नहीं मानता.

गोविन्द सिंह अयिसवाल ने माक्र्स की दो महत्वपूर्ण कविताएं प्रस्तुत की और माक्र्स के घोषणा पत्र की प्रारंभिक पंक्तियां- ‘मजदूरों-श्रमकों तुम्हारे पास खोने के लिये कुछ नहीं पाने के लिये सारी दुनिया है को उद्धरित किया और उनके मूल सिद्घांतों को भी संक्षेप में सभा के समक्ष रखा. अंत में आभार प्रदर्शन दिनेश नायर द्वारा किया गया.

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