त्यौहारी सीजन के शुरु होते ही शहर में मावा और घी व्यापारियों के यहां खाद्य विभाव और नगर निगम का अमला जांच के लिए पहुंच रहा है और नकली मावा बेचने वालों पर कार्र्रवाई कर रहा है. ऐसे में इन व्यापारियों में घबराहट है, वहीं त्यौहारी सीजन बिगडऩे का अंदेशा भी है. इन सब के बीच एक खास बात यह है कि इन्दौर में मावा बनता ही नहीं है”

इन्दौर 13 अक्टूबर. इंदौर और आसपास एक भी मावा बनाने वाला नहीं है. पर त्यौहारी सीजन में यहां भारी मात्रा में मावा बिकता है और भारी मात्रा में नकली (सिंथेटिक) मावा पकड़ाता भी है. यहां जितना भी मावा आता है, सब शाजापुर और ग्वालियर लाइन से आता है और यहां से आसपास के शहरों के अलावा अहमदाबाद, पूणे और नासिक तक जाता है. इन्दौर में मावे के करीब 70-80 व्यापारी है. जिनका व्यापार दूर-दूर तक फैला है. अगर हम मावे के  भाव और क्वालिटी की बात करें तो रतलाम का मावा अच्छा माना जाता है. रतलाम में शाजापुर या ग्वालियर का मावा नहीं बेचा जाता है. ये व्यापारी झाबुआ-रतलाम के आसपास बनने वाला मावा ही बेचते हैं. जो घीदार और शुद्ध होने से इन्दौर और उज्जैन में बिकने वाले मावे से महंगा होता है. जबकि उज्जैन में मावा सस्ता बिकता है. ये व्यापारी शाजापुर और उज्जैन के आसपास से ही हल्की क्वालिटी का मावा मंगवाते है. कहा जाता है कि ये मावा सप्रेटा दूध से बना होने के साथ शकर और आलू की मिलावट वाला होता है.

  •  दो तरह का मावा

रतलाम में सफेद और पीला मावा बिकता है. इनके भाव में भी अंतर रहता है. भैंस के दूध का मावा सफेद और गाय के दूध का मावा पीला होता है.

  • नकली मावा

सप्रेटा दूध से बने मावे में शकर और आलू की मिलावट होती है. इसमें घी बिल्कुल नहीं होता इसलिए यह नकली (सिंथेटिक) मावा कहलाता है. कोल्ड स्टोरे में ज्यादा दिनों तक रखा मावा भी नकली की श्रेणी में आता है. चूँकि मावा बाहर से आता है इसलिए ताजा मिलाना संभव नहीं है. शाजापुर का मावा जल्दी खराब हो जाता है. इसे फ्रीज या कोल्ड स्टोरेज में रखकर बचाया जाता है. ये भैंड़, बकरी या गाय के दूध या सप्रेटा दूध से बना होने के कारण जल्दी खराब हो जाता है. जबकि ग्वालियर का मावा भैंस के दूध का होने से 2-3 दिन तक खराब नहीं होता इसलिए इसे दूर-दराज तक भेजा जा सकता है.

  •  फैंकने से तो रहे…

एक व्यापारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हम मावा नहीं बनाते. जैसा आता है, वैसा बेच देते है. वैसे विभाग की सख्ती के कारण क्वालिटी में सुधार आया है. रही बात स्टाक की तो बचा हुआ माल फ्रीज या कोल्ड स्टोर में रखते हैं. फेंकने से तो रहे,बेचना ही पड़ता है. अगर ऐसा नहीं करें तो कम उपलब्धि के कारण पूर्ति करना मुश्किल हो जाए.

  •  खुद का मावा बनाते हैं

मिठाई निर्माता मथुरावाला स्वीट्स पर राजू मथुरावाला से बात की तो उनका कहना था कि हम तो मिठाई बनाने के लिए खुद के कारीगरों से मावा बनवाते हैं. सिंथेटिक मावे का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाता है. वैसे भी आजकल बेसन की बनी मिठाई और बंगाली मिठाई ज्यादा पसंद की जा रही है.

  •  छोड़ जाते हैं पोटली

ट्रेवल्स की बसों में रोज हजारों किलो मावा इन्दौर आता है. और जब विभागीय कार्र्रवाई होती है तो इन मावे की पोटलियों का कोई मालिक सामने नहीं आता है. इस तरह ये विभागीय कार्र्रवाई से बच जाते हैं. फिर विभाग को इसे मजबूरी में नष्ट करना पड़ता है.

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