मध्य प्रदेश के महानगरों भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर को मेट्रो महानगर का दर्जा दिया जा रहा है. इसके लिये राज्य योजना आयोग ने एक प्रस्ताव बनाया है कि प्रत्येक प्रस्तावित मेट्रोनगर के लिये एक मेट्रोपोलेटन समिति बनाई जायेगी, जो नगर निगम के मेयर के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रहेगी. जिन मेट्रो नगरों की आबादी 30 लाख से ज्यादा होगी उस पर नगरीय विकास मंत्री का नियंत्रण रहेगा.

अभी भी यह हालत है कि इन महानगरों में पास के शहरों से रोज हजारों व्यक्ति नौकरी करने या अन्य कामों के लिये आते हैं. ये रेलवे के मासिक सीजन टिकिट धारी भी होते हैं, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में ऐसे लोगों को महानगर में रहना दिखाना पड़ता है. ये लोग किराये का मकान रखते हैं, लेकिन वास्तव में अपने नगरों को रोज लौट भी जाते हैं. मेट्रो स्तर मिलने के बाद यहां काम करने वालों को शहर में हेडक्वाटर रखना बाध्यकारी नहीं होगा. ये अपने पास के नगरों को लौट सकते हैं. इससे रोज आने जाने वालों को बहुत सुविधा हो जायेगी. इसके लिये यह भी जरूरी होता है कि नगर निगम सिटी बसों के अलावा पास के नगरों तक रोज आने जाने वालों के लिये रियायती मासिक टिकिट पर सिटी बसों की व्यवस्था करें. मेट्रोनगरों के पास कई ऐसे नगर है, जहां रेल प्रणाली नहीं है. मेट्रोनगरों के आसपास के सभी नगर हमेशा चलती रहने वाली यातायात प्रणाली से जुड़े रहे. रेलवे को भी पास के नगरों से मैट्रो महानगरों तक रेल की शटल व्यवस्था या लोकल ट्रेन प्रणाली स्थापित करनी चाहिये. इस तरह की व्यवस्था से मेट्रोनगरों पर आबादी का दबाव भी काफी कम हो जायेगा. दिन या रात की नौकरी के बाद अपने घरों को लौट जायेंगे. अभी इस पर विचार चल रहा है कि मेट्रो समितियों के लिये अलग से कोई कानून बनाया जाये या वर्तमान नगरीय एवं ग्रामीण निकाय कानून में ही संशोधन करके इन मेट्रो समितियों को विधिवत कर दिया जाये.

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