पन्ना, 31 अक्टूबर. उथली हीरा खदानों से निकलने वाले बेशकीमती हीरों का काला कारोबार बेखौफ जारी है. जिले में संचालित होने वाली उथली खदानों से हर साल 50 करोड़ रू. से भी अधिक कीमत के हीरे निकलते हैं, लेकिन हीरा कार्यालय में ये हीरे जमा नहीं हो पाते. अधिकांश हीरों की चोरी – छिपे बिक्री हो जाती है, जिससे शासन को हर साल करोडों रू. के राजस्व की क्षति होती है.

उल्लेखनीय है कि जिला मुख्यालय पन्ना में देश का इकलौता हीरा कार्यालय है, जहां पर हीरा अधिकारी से लेकर हीरा पारखी, हवलदार व अन्य कर्मचारी पदस्थ हैं. हीरा कार्यालय से हर साल हीरों की खोज के लिए पट्टे जारी किये जाते हैं, जहां संबंधित व्यक्तियों द्वारा खुदाई कराई जाकर हीरों की तलाश की जाती है. राजस्व भूमि के अलावा हीरा कार्यालय द्वारा निजी पट्टे की भूमि में भी खदान संचालित करने की अनुमति दी जाती है, इसके अलावा हीरा धारित वन क्षेत्र में भी अवैध रूप से बड़ी संख्या में खदानें चलती हैं. सर्वाधिक हीरा खदानें इटवां सरकिल में चलती हैं तथा इस क्षेत्र में सबसे अधिक हीरा भी निकलते हैं. लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि सर्वाधिक हीरा खदानों वाले इस इलाके में निकलने वाले हीरे नियमानुसार हीरा कार्यालय में जमा नहीं होते. इटवां सरकिल में बगीचा, किटहा, हजारा, मडफ़ा, हरका हजारा मुढ्ढा, रमखिरिया तथा सिरसा द्वारा आदि क्षेत्रों में हीरा खदान के पट्टे दिए गये हैं. अकेले इटवां सरकिल में हीरा खदानों के कुल 284 पट्टे जारी हुए हं, लेकिन इन खदानों से एक भी कीमती हीरा जमा नहीं हुआ. जबकि पन्ना के आसपास खदानों से निकलने वाले हीरे यदा कदा जमा होते हैं.

पिछले दिनों दहलान चौकी में एक आदिवासी को 16 कैरेट वजन का हीरा मिला था, जिसे उसने जमा किया था. इटवां सरकिल में अधिकांश खदानें बड़े कारोबारियों की होती हैं, इसलिए ये लोग हीरा मिलने पर उसे जमा करने के बजाय सीधे व्यापारियों को बिक्री कर देते हैं. इस काले कारोबार पर हीरा कार्यालय का सीधे तौर पर कोई अंकुश नहीं है, फलस्वरूप बेशकीमती हीरों की तस्करी का धंधा यहां खूब फल फूल रहा है.

जानकारों के मुताबिक इटवां सरकिल में ही सौ से भी अधिक लोग ऐसे हैं जो सीधे तौर पर हीरा कारोबार से जुड़े हैं तथा हर साल तकरीबन 10 लाख रू. से भी अधिक राशि हीरा खदानों में व्यय करते हैं. हीरा खदानों में खुदाई का काम करने वाली जेसीबी मशीने एक सीजन में दो से ढाई करोड़ रू. का धंधा करती हं. इतनी भारी भरकम राशि हीरा खदानों में व्यय की जाती है, फिर भी इस क्षेत्र से एक भी हीरे जमा नहीं होते. यदि हीरा नहीं मिलते तो फिर हर साल लोग हीरों की तलाश में लाखों रू. क्यों खर्च करते हं तथा यह पैसा कहां से आता है, क्या कभी इस बात की गहराई से छानबीन की गई है. फोटो नं. 2, 3 एवं 4 – उथली हीरा खदान का दृश्य तथा हीरा धारित चाल में हीरों की तलाश करते श्रमिक, खदान से प्राप्त हीरे

  •  क्यों होती है तस्करी

जिले की उथली हीरा खदानों से प्राप्त होने वाले बेशकीमती हीरों की तस्करी क्यों होती है, इसकी तहकीकात किये जाने पर हीरा कारोबार करने पर तुआदार (हीरा धारक) को तुरन्त पैसा नहीं मिलता. हीरा जमा होने पर जब नीलामी होती है और हीरा बिकता है तब पैसा मिलता है. इस प्रक्रिया में कई महीने लग जाते हंै, जबकि हीरा कारोबारियों को सीधे बेंचने से तुआदार को तुरन्त पैसा मिल जाता है. व्यवस्था में इस खामी के कारण ही अधिकांश हीरों की चोरी – छिपे बिक्री कर दी जाती है.

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