मध्यप्रदेश में अभी सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के किसान मोर्चा आंदोलनकारियों ने राज्य भर में उनके आंदोलन के संदर्भ में रेलें रोकीं. मामला सरकारी पार्टी का था इसलिए तोड़-फोड़ नहीं की गई. सिर्फ आत्म प्रचार व प्रदर्शन के लिये फोटो जरूर खिंचवाई गई. इससे पूर्व भोपाल में गैस पीडि़तों ने भी उनके आंदोलन में रेलों को रोका. भोपाल में हाईकोर्ट बेंच बने इस पर वकीलों ने भी रेलों का चलना बाधित किया था.

यह मामला मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे देश व्यापी स्तर पर शुरू हो गया है और तेजी से फैल रहा है. वह दिन आ ही गया है कि रेलों का चलना दूभर हो जायेगा. किसी भी मांग पर किसी भी स्तर का आंदोलन जो होगा. उसका उस क्षेत्र में रेलों को रोककर चलाया जायेगा. अभी तक यह धारणा बनी हुई है कि आंदोलन की सफलता इसमें है कि उसमें हिंसा व भय कितना है. बाजार तोड़-फोड़ की दहशत से बंद होते रहेंगे. सर्वोच्च न्यायालय ‘बंद’ को अवैध घोषित कर चुका है. लेकिन ‘बंद’ है कि ‘बंद’ नहीं हो रहे है. अब बाजार बंद बढ़कर रेल बंद हो गया है.

श्री लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री काल में तमिलनाडु से द्रविड़ मुनैत्र कषघम ने हिन्दी के विरोध में जो आंदोलन चलाया था उसमें रेलों पर जबरदस्त हमला किया गया था और उसका संचालन ठप्प हो गया था. हिन्दी लागू न करने की उनकी मांग मान ली गई. इसमें इतनी बुरी परंपरा बन गई कि आंदोलन की सफलता के लिये रेलों को रोकना सबसे सुलभ व आसान तरीका हो गया. राजस्थान के गूजर इसमें भी आगे बढ़ गये. उन्होंने अपनी आरक्षण की मांग पर देश के मुंबई सेंट्रल व नई दिल्ली के बीच राजस्थान वाले भाग से एक महीने तक सभी तरह का रेल यातायात रोक दिया. सरकार भी तमाशबीन बनी चुप बैठ गई. जब सुप्रीम कोर्ट ने इस शासकीय उदासीनता पर मामला अपने हाथ में लिया तब कही जाकर रेल पथ चालू हुआ.

हरियाणा के गूजरों ने भी यही रेल रोको रास्ता अपनाया. यहां भी सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा. पंजाब में फांसी की सजा पर चल रहे आंदोलन में भी रेलें रोकी गई. झारखंड में नक्सलियों ने राजधानी एक्सप्रेस को भी दिन-दहाड़े अगवा कर अपने कब्जे में काफी समय तक रखा. आसाम में भी बोडो व उल्फा आंदोलन में भी रेलों में विस्फोट हो रहे है. गरज यह है कि अब सभी राजनैतिक व अन्य प्रकार के सभी आंदोलनों का यह स्वरूप हो गया है कि रेल पटरी पर कुछ लोग जाकर बैठे जाए और रेल यातायात रोक दें. चाहे तोड़-फोड़ करे या रेल एन्जिन पर चढ़कर फोटो खिंचा लें.

संविधान में निहित मूलभूत अधिकार व्यक्तिगत व सामूहिक दोनों होते हैं. रेलों व अन्य सभी सार्वजनिक यातायात का लगातार निर्बाध चलते रहना लोगों के आवागमन की स्वतंत्रता का मूलभूत अधिकार का सामूहिक रूप है. इसे सुनिश्चित करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है और सरकार इस दायित्व से विमुख होती जा रही है. यह अराजकता की स्थिति है. प्रजातंत्र में सभी जगह लोकल से लेकर राज्य और राष्ट्र स्तर के आंदोलन तो चलेंगे और रेलों को नहीं चलने दिया जायेगा.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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