भोपाल, 25 अप्रैल.आजादी के आन्दोलन में तपकर निखरे प्रो. अक्षय कुमार जैन जीवन भर तपे हुए सोने की तरह दमकते रहे. हिन्दू और मुस्लिम समाजों की एकता और भाईचारे को उन्होंने जिस तरह विकसित किया वह अविस्मर्णीय है.

उपरोक्त कथन डॉ. विजय बहादुर सिंह ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन के दौरान ”अक्षय बाबू की यादें” कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहे. आदिशक्ति साहित्य कला परिषद द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम तदोपरांत परिषद के अध्यक्ष खलील कुरैशी ने आदिशक्ति सहित्य कला परिषद के गठन वर्ष 2007 से लेकर 28 दिसम्बर 2011 के मध्य हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित किये गये, विभिन्न कार्यक्रमों के संदर्भ में अध्यक्ष के रूप में जैन साहब का पुर्न-स्मरण किया. मोहन सिंह ठाकुर ने कहा कि जैन साहब के जाने से उनके कार्यक्रमों का स्थायी अध्यक्ष एसएल हरदेनियां ने कहा कि जैन साहब का जाना भोपाल वासियों के लिये एक बड़ी क्षती है.

साहित्यकार के पूर्व वे एक जुझारू विलीनीकरण आन्दोलन के नेता के रूप में हमारे सामने आये और उन्होंने इस आन्दोलन को भाई रतन कुमार, मास्टर लालसिंह श्रीमती लीला राय, कामरेड बालकृष्ण गुप्ता के साथ कंधा से कंधा मिलाकर संघर्स किया एवं सफल बनाया. शैलेन्द्र कुमार शैली ने कहा कि वे मेरे मार्गदर्शक थे उन्होंने पिता के रूप में भाग लेकर मेरा विवाह कराया था. डॉ. विकल ने कहा कि जैन साहब के साथ मंचों पर विगत 6-7 वर्षों से सतत बैठने का मौका मिला. मंच पर बैठे-बैठे वे ऐसी मधुर चुटकी लेते थे कि खिलखिलाकर हंसने को मन करता था. परंतु मंचासीन होने के करण मन मसोस कर रह जाता था.

पीसी शर्मा ने कहा कि भाई मोहन सिंह ठाकुर के आग्रह पर मैं कई बार आदिशक्ति के कार्यक्रमों में आया मुझे जैन साहब से मिलकर अच्छा लगता था उनकी बातें बड़ी प्रेरक और जीवन के लिये उपयोगी होती थी. इस अवसर पर शताधिक रचनाकारों, सामाजसेवियों, राजनैतिक प्रतिनिधियों ने कार्यक्रम में भाग लिया. अंत में आभार प्रदर्शन परिषद के उपध्यक्ष खलील कुरैशी द्वारा किया गया.

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