आशा के विपरीत रिजर्व बैंक ने अपनी तिमाही समीक्षा में वर्तमान में उसकी मौद्रिक नीति को यथावत् रखा है. उसमें कोई भी परिवर्तन नहीं किया गया है. इसमें स्वत: एक बड़ा परिवर्तन यह अवश्य हो गया है कि रिजर्व बैंक अब तक लगातार रेपो और रिवर्स रेपो 13 बार बढ़ता गया लेकिन इस बार नहीं बढ़ाए
गए हैं.

इस समय रेपो रेट्स 7.5 प्रतिशत और सी.आर.आर. (क्रेश क्रेडिट रेशो) 6 प्रतिशत पर यथावत् रहेंगे. अभी तक महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए रेपो और सी.आर.आर. रेट्स बढ़ाये जाते रहे. इससे महंगाई पर तो अंकुश लगा नहीं लेकिन वह औद्योगिक निवेश पर अंकुश जरूर बन गया. इसकी वजह से विकास दर भी सर्वाधिक घटकर 5 प्रतिशत पर आ गई है. आम लोगों के खरीदने की शक्ति भी घटती जा रही है. ऐसे में यह अपेक्षा की जा रही थी रिजर्व बैंक इस समीक्षा में दरों में कटौती की घोषणा करेगा. जिससे निवेश बढऩे से औद्योगिक विकास दर में वृद्धि होगी.औद्योगिक एवं व्यापार जगत के लिए मौद्रिक नीति में यथावत् की स्थिति बनाये रखने से निराशा है.ब्याज दरों में कोई परिवर्तन नहीं होने से बाजार में पूंजी संकुचन और पूंजी का अभाव बना रहेगा. आवास ऋणों में वृद्धि रहने के कारण आवास क्षेत्र में भी संकट बना हुआ है. नये लोग मकान खरीद नहीं रहे हैं. रिजर्व बैंक के गवर्नर श्री डी. सुब्बा राव का कहना है कि वे अभी प्रतीक्षा करो और देखो की नीति पर ही चलेंगे.

डालर के मुकाबले भारत के रुपये की कीमतों में भी गिरावट में चलकर न्यूनतम 54.30 प्रति डालर पर पहुंच गई. इस स्थिति में रिजर्व बैंक ने राष्ट्रीयकृत बैंकों के जरिये डालर बेचकर रुपया को और गिरने से बचाया और वह 53.65 प्रति डालर पर बंद हुआ जबकि यह 54.20 पर खुला था. अंतरराष्ट्रीय बाजार में डालर के मुकाबले दूसरे देशों की मुद्राएं गिर रही हैं. गत तीन दिनों में यूरो 3 प्रतिशत तक गिर गया लेकिन रुपये के गिरने की दर यूरो के गिरने की दर से ज्यादा रही है. रुपये को गिरने से बचाने के लिए रिजर्व बैंक अन्य उपाय भी कर रहा है.उसने बैंकों की ट्रेडिंग लिमिट भी घटा दी है. जिन व्यापारियों और विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा फारवर्ड कान्ट्रेक्ट रद्द किये जायेंगे, उन्हें दुबारा बुक नहीं किया जायेगा. निर्यातकर्ता और निवेशक इसका इस्तेमाल जोखिम को कम करने के लिये प्रयोग करते हैं जिसमें निश्चित मूल्य पर डालर बेचा जाता है. रुपये की तेज गिरावट रोकने के लिये इसे खासतौर पर प्रतिबंधित किया गया है. सब्जियों के भाव गिरने से खाद्यान्न की मुद्रास्फीति में 4.35 प्रतिशत की कमी आई है, लेकिन सब्जियां जल्दी ही खराब होने वाली वस्तुयें हैं इसलिये इनके भाव इनकी आवक पर तय होते हैं. यदि मावठा (शीत वर्षा) हो जाए तो आवक कम होने से उसी दिन भाव बढ़ जायेंगे. सब्जी के आधार पर मुद्रास्फीति का गिरना-चढऩा स्थाई या दीर्घकालीन नहीं रहता. इन दिनों पंजाब के जालंधर में आलू की बम्पर उपज आने से उसके भाव 20 पैसे किलो हो गये. किसानों ने विरोध स्वरूप उसे सड़कों पर फेंक दिया और लोग उसे मुफ्त में उठाकर ले गये. कभी मध्यप्रदेश में प्याज भी किसानों ने उखाड़कर खेतों के बाहर ही फेंक दी. केन्द्रीय खाद्य मंत्री श्री शरद पवार की नीति है कि सब्जियां तेजी से खराब (पेरेशेबिल) वस्तुयें हैं इसलिये न तो उनका समर्थन मूल्य हो सकता है और न ही सरकार उसे कभी खरीदेगी. क्योंकि सब्जियां स्टोर नहीं होतीं. उसे फौरन बेचना पड़ता है इसलिये उसके मूल्य अधिक या कम आपूर्ति से ही तय होते रहेंगे.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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