कुछ दिन पूर्व ही यह घोषणा की थी रिजर्व बैंक रुपये के गिरते मूल्य को सम्हालने के लिये कुछ बड़े कदम उठाने जा रहा है. केंद्रीय वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी जाते-जाते कुछ करिश्मा कर जायेंगे यह धारणा भी बन गई थी. लेकिन उनकी बिदाई के दिन ही जो घोषणा रिजर्व बैंक ने की उससे तो तमाम उम्मीदों की ही बिदाई हो गई.

रुपया का मूल्य सम्हला नहीं बल्कि डालर के मुकाबले लगभग 58 (57.92) हो गया. उम्मीद यह भी थी कि कुछ ऐसे कदम अवश्य उठाये जायेंगे कि खाद्यान्नों की सट्टï बाजारी पर भी कड़ी रोक लगेगी. लेकिन न रुपया सम्हला और न ही सट्टï बाजारी खत्म हो रही है. सट्टï बाजारी में सामान एक ही जगह रखा रहना और व्यापारियों की सट्टेबाजी में उसके मूल्य ही बढ़ते रहते है. यह सिलसिला चलता चला जा रहा है. इस समय की अर्थव्यवस्था रुपया गिरने से एक नई मुसीबत सी आ गई है.

आम तौर पर मुद्रा अवमूल्यन से आयात महंगा और निर्यात भारी मुनाफे का हो जाता है. लेकिन इस समय आयात के महंगा होने के साथ निर्यात भी ”कट रेटÓÓ पर आ गया है. निर्यातकों का तर्क है कि रुपया बराबर गिरता जा रहा है- कहीं रुक नहीं रहा है. ऐसे में निर्यात-आयात सौदों के भाव किस रेट पर तय करें. इसलिए भारत से आयात करने वाले हजार देश के निर्यातकों से कह रहे है कि रुपया घट रहा है तो वे भी अपने भाव घटायें. विदेशी खरीददार मोलभाव कर रहे हैं. और छूट (कट और डिस्काउंट) मांग रहे है. सिर्फ रुपये की अस्थिरता से ही पूरा निर्यात बाजार ही अस्थिर हो गया है. खरीददार आर्डर ही नहीं दे रहे हैं. गत वित्त वर्ष 2011-12 में भारत से 457 करोड़ डालर का चमड़ा निर्यात हुआ था और इसमें 22 प्रतिशत की बढ़त हुई थी. लेकिन यह सौदे 52-53 रुपये प्रति डालर पर हुये थे. अब रुपया 58 के भी पार जाता दिख रहा है. इस वजह से निर्यात घट जाने से निर्यातक भी घाटे में है.

चिन्ताजनक स्थिति यह है कि पेट्रो व अन्य आयातों पर विदेशी मुद्रा में देनदारी बढ़ रही है. निर्यात घटने से विदेशी मुद्रा की आवक कम हो रही है. देश में व्यापार भुगतान में असंतुलन बढ़ता जा रहा है.रिजर्व बैंक की घोषणा से न तो रुपया सम्हला बल्कि सेंसेक्स 90 पाइंट लुढ़क गया. उम्मीद थी कि घोषणा के साथ ही बाजार में उत्साह व उछाल आयेगा- लेकिन उसकी वजह से निराशा बढ़ गई. ब्याज दरों, रेपो रेट्स में कोई परिवर्तन नहीं है. विदेशी संस्थागत निवेशों के लिये सीमा 10 से बढ़ाकर 20 अरब डालर कर दी. भारतीय कम्पनियां विदेशों से 10 अरब डालर का ऋण ले सकेंगी.

भारत के दूसरे सबसे बड़े भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन श्री प्रतीप चौधरी ने कहा है कि रिजर्व बैंक के कदम नाकाफी हैं. अभी और पूंजीगत निवेशकों की जरूरत है. भारत में आयात ज्यादा है और निर्यात कम. निर्यात क्षमता को बढ़ाने के लिये केन्द्र के वाणिज्य मंत्रालय ने 7 सूत्री निर्यातवर्धन का कार्यक्रम बनाया. लेकिन रुपये के बराबर गिरते जाने से आयात व निर्यातक देश रुपये की अस्थिरता के कारण भाव तय नहीं हो पाने से भारत का निर्यात व्यापार शिथिल पड़ गया है. इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत रुपये का मूल्य स्थिर करना है और उसे हमेशा से स्थापित मूल्य 45 से 48 रुपये प्रति डालर पर लाना होगा.

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