देश में मानसून का आना देर से हुआ और बीच-बीच में इसके क्रम में परिवर्तन से भी मौसम से नुकसान हो रहा है. मानसून का अर्थ केवल पानी का गिरना ही नहीं होता बल्कि इसका पूरे वर्षा में बरसना और रुकना दोनों का समयानुकूल होना भी जरूरी है. यदि कुछ दिनो में पूरी बरसात हो जाए तो वह केवल सेंटीमीटर की गणना में पूरी या उससे ज्यादा कम हो गई. लेकिन खेती के लिए उसका कोई अर्थ नहीं होता. ज्यादा दिन बरसने से कीचड़़ की वजह से बोनी नहीं हो सकती और कचरा भी देर से पैदा व खत्म होता है.

इस समय स्थिति यह है कि पूरे देश में मानसून छाया हुआ है लेकिन एक महीने की देरी की वजह से अभी उसका प्रतिशत 23 प्रतिशत कम है. मध्यप्रदेश में अब तक जितनी बरसात हो जानी चाहिए थी उससे 13 प्रतिशत कम हुई है. बरसात शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद जून माह में बादल बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्र बनने से पूर्वी राज्यों की तरफ चले गए, लौटकर आया कुछ दिन ही बरसा और राजस्थान की तरफ बढ़ गया है. मालवा अंचल को अभी भी पूरी वर्षा का इंतजार है.

वर्षा के समय हमारी तैयारियां व व्यवस्थाओं का तो हाल ही बेहाल है.अभी पानी जैसा पानी नहीं गिरा है लेकिन जहां भी थोड़ा तेजी से बरस गया वहां के गांवों व शहरों में बाढ़ आ गई. नगरों में आपस में सड़क संपर्क टूट गए, घरों में पानी भर गया. बरसात रुकी तो गर्मी व आद्र्रता बढ़ गई है. एक छोटी सी बात मानसून के क्रम के महत्व व जरूरत को दर्शाती है. भोपाल के पास गैरतगंज क्षेत्र में किसान पानी न गिरने से चिंतित थे. यह सोयाबीन की खेती का इलाका है और सोयाबीन की बोनी नहीं हो पा रही थी. अब वहां मूसलाधार वर्षा हो गई तो खेतों में कीचड़ हो जाने से बोनी नहीं हो पा रही

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