देश में मानसूनी वर्षा की लेट लतीफी में ‘सावन बीता जाये’ की स्थिति नजर आने लगी थी. माह का पहला पखवाड़ा कृष्ण पक्ष सूखा चला गया. किसानी मुहावरा ‘सावन हरा -भादों भरा’ के बारे में चिंता होने लगी थी, लेकिन शुक्ल पक्ष प्रारंभ होते ही ऐसा जाहिर तो हो रहा है कि मानसून लौट आया है, लेकिन सावन की बरसात का अर्थ पानी की झड़ी लगना होता है, वह स्थिति अभी नहीं बनी. थोड़ी देर जोर की बरसात झड़ी की स्थिति नहीं होती. भोपाल में तृतीया तिथि को 10 मिलीमीटर वर्षा हुई और राज्य के अन्य भागों में भी वर्षा होने लगी है.
मानसून का दूसरा दौर बंगाल की खाड़ी में बने सिस्टम से उठकर छत्तीसगढ से होता हुआ मध्य प्रदेश में आ गया है. इसकी वजह से जबलपुर, सिवनी, बालाघाट, छिंदवाड़ा, शहडोल, दमोह, मंडला, सीधी, टीकमगढ़, कटनी, दतिया, सागर जिलों में फैलकर बरसात हो रही है. हवायें तेज चलने से बादल आ भी रहे हैं और जा भी रहे हैं. जहां कुछ गर्म वातावरण मिल जाता है,बरसजाते हैं.

मध्य प्रदेश में सबसे पहले हिन्द महासागर में मेड़ागास्कर द्वीप के क्षेत्र में बना मानसून अरब सागर होता हुआ पश्चिमी भारत के बाद मध्य प्रदेश में भी आता है. इससे लगा हुआ पूर्वी भाग में बंगाल की खाड़ी का मानसून आता है. अभी पश्चिमी मानसून केरल, कोंकण व मुंबई तो पहुंच चुका है, लेकिन मध्य महाराष्ट्र होता हुआ मध्य प्रदेश में नहीं आया. मध्य प्रदेश के पश्चिमी जिलों को पश्चिमी मानसून का इंतजार है. ऐसी संभावना बनती जा रही है कि वह भी शीघ्र ही गुजरात, महाराष्ट्र होता हुआ मध्य प्रदेश व राजस्थान में पहुंचने ही वाला है.
बंगाल की खाड़ी में बने सिस्टम से मध्य प्रदेश में खेती की स्थिति में काफी सुधार आ जायेगा. सबसे बड़ी चिंता सोयाबीन व धान की फसलों की है. वर्षा की देर से इनके टाइम टेबिल बिगड़ गये हैं.

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