नई दिल्ली, 19 मार्च. देश की लगभग 30 फीसद आबादी अब भी गरीब है. दूसरे शब्दों में कहें तो 35.46 करोड़ जनता देश में औसतन 26 रुपये प्रति दिन पर गुजारा कर रही है. यह स्थिति तब है, जब देश की आर्थिक विकास दर आजादी के बाद सबसे तेज रही है.

योजना आयोग ने सोमवार को गरीबों की संख्या पर रिपोर्ट जारी की है. तेंदुलकर समिति के फार्मूले पर तैयार इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2004-05 में देश में गरीबों की संख्या 40.72 करोड़ थी, जो वर्ष 2009-10 में घट कर 35.46 करोड़ हो गई है. दूसरे शब्दों में तब 37.2 प्रतिशत आबादी गरीब थी, जिनकी संख्या घट कर 29.8 प्रतिशत हो गई है. ये आंकड़े यह भी बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम को ज्यादा सफलता मिली है क्योंकि इस दौरान ग्रामीण गरीबों की संख्या में 8 फीसद की गिरावट हुई है. जबकि शहरी क्षेत्रों में 4.8 फीसद गरीब कम हुए हैं.योजना आयोग का यह आकलन एक तरह से संप्रग के पहले कार्यकाल की सीधी समीक्षा है.

संप्रग पहली बार जून, 2004 में सत्ता में आया था. उसके बाद के पांच वर्षो तक देश की आर्थिक विकास दर क्रमश: 6.9 फीसद, 9.5, 9.6, 9.3 और 6.8 फीसद रही है. इस दौरान आबादी में 4.26 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा के उपर लाने में सफलता हासिल हुई है. इस तरह से देखा जाए तो अगर अगले चार दशकों तक नौ फीसद या इससे ज्यादा की आर्थिक विकास दर हासिल की जाती है, तब कहीं जाकर अगले तीन से चार दशकों के बीच गरीबी का खात्मा हो सकेगा.योजना आयोग के आंकड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य उजागर करते हैं जो आने वाले दिनों सरकार के नीति निर्धारण में काफी जरूरी साबित हो सकते हैं. मसलन अनुसूचित जनजाति [एसटी] की 47.4 फीसद आबादी अब भी गरीबी रेखा के नीचे रहती है. गांवों में 42.3 फीसद अनुसूचित जाति [एससी], 31.9 फीसद अन्य पिछड़ी जाति के लोग गरीब है. शहरी इलाकों में भी लगभग यही स्थिति है. बिहार और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में दो तिहाई एससी एवं एसटी गरीबी रेखा के नीचे हैं.

आंकड़े भी कुछ कहते हैं

-ग्रामीण क्षेत्रों में सिख तो शहरी क्षेत्र में इसाई धर्म में सबसे कम गरीबी

-असम, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज्यादा मुस्लिम गरीब

-बिहार के शहरी क्षेत्र में रहने वाले 56.5 फीसद मुस्लिम गरीब

-उत्तर प्रदेश के शहरों में रहने वाले 49.5 फीसद व गुजरात के 42.4 फीसद मुसलमान गरीब

कीमतें चढ़ीं तो बढ़ेगी मुश्किल

मनीला. खाद्यान्न की कीमतों में 10 फीसदी की बढ़ोतरी हुई तो भारत के तीन करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाएंगे. एशियाई विकास बैंक [एडीबी] ने अपनी ताजा रिपोर्ट में यह आशंका जताई है. भारत के साथ बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी मूल्यवृद्धि गरीबों की संख्या में क्रमश: 40 लाख और 35 लाख लोगों को गुरबत की ओर धकेल देगी. रिपोर्ट में बताया गया है कि खाद्यान्न की कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे कम असर नेपाल और श्रीलंका पर पड़ेगा.

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