नयी दिल्ली, 20 सितंबर. विकसित राज्यों के साथ कदमताल करने वाले मध्यप्रदेश का जीडीपी भले ही 8 प्रतिशत से ऊपर हो लेकिन प्रदेश में बेरोजगारों की फेहरिस्त लाखों में हो चुकी है. रोजगार का सपना संजोये हुए लाखों बेरोजगार दिन रात केवल यही सोचते है कि नौकरी कैसे मिलेगी? बेरोजगारों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि सरकार के कार्यप्रणाली पर प्रश्रचिन्ह खड़ा हो गया है.

भले ही सरकारी रिपोर्ट में इसकी संख्या 14 लाख दिखाई गई हो लेकिन यह संख्या व्यवहारिक तौर पर काफी अधिक हो सकती है. हालांकि इस फेहरिस्त में पश्चिम बंगाल सबसे ऊपर है. जहां 36 लाख से अधिक युवक बेरोजगार है. दूसरे स्थान पर तमिलनाड् है जहां बेरोजगारों की संख्या 35 लाख से अधिक है.

मध्यप्रदेश में यह संख्या 14 लाख 15 हजार है. लेकिन कुछ राज्य ऐसे है जहां आनुपातिक बेरोजगारी की संख्या काफी कम है. पंजाब में तीन लाख, दिल्ली में चार लाख, और बिहार में बेरोजगारों की संख्या छह लाख है. यह आंकड़ा रोजगार कार्यालय में पंजीकृत नवयुवकों का है जो बेरोजगारी जैसी मुसीबतों को झेल रहे हैं. ध्यान देने योग्य बात यह है कि टैक्रो युग में रोजगार कार्यालय में लोग अपना नाम पंजीकृत नहीं कराते हैं. क्योंकि ज्यादातर निजी कंपनियां रोजगार कार्यालय के माध्यम से किसी युवक को नौकरी नहीं देती है या किसी युवक को साक्षात्कार के लिए नहीं बुलाती है.

सरकार इस बात की दावा कर रही है कि प्रदेश में लगातार विकास हो रहा है लेकिन  जब सूबे में इतने बडे पैमाने पर रजिस्टर्ड बेरोजगारों की संख्या हो तो यह किस प्रकार का विकास हो रहा है इसे समझा जा सकता है. संभवत: कागजी खानापूर्ति का ही आलम है कि जीडीपी ज्यादा होने के बाद भी  पिछले दस सालों में प्रदेश में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या में भी काफी तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है. दिलचस्प बात है कि प्रदेश में हजारों की संख्या में छोटी-बड़ी कंपनियां है ऐसे में इतने बड़े संख्या में बेरोजगारी कैसे हैं? गौरतलब है कि गत कुछ वित्तीय वर्षो में सरकार ने साल दर साल अच्छी विकास दर हासिल की है.

लेकिन बेरोजगारों की बढ़ती संख्या को देख यह कहा जा रहा है कि आखिर यह विकास कैसे हो रहा है. क्योंकि विकास के साथ रोजगार का पूरक संबंध माना जाता है.

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