भोपाल, 13 नवम्बर. म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन अपने गरिमामय आयोजनों की श्रंखला में छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साथ संयुक्त रूप से दो दिवसीय मुक्तिबोध स्मृति कविता समारोह का आज द्वितीय एवं तृतीय सत्र में वरिष्ठï समकालीन कवियों के काव्य पाठ के साथ सम्पन्न हुआ.

द्वितीय सत्र प्रेमशंकर रघुवंशी एवं संतोष चौबे की दो अध्यक्षिय व्यवस्था में हुआ. एवं संचालन पूर्णचंद्र रथ ने किया. राग तैलंग, ओम भारती, बलराम गुमास्ता, महेन्द्र गगन, कमलेश्वर साहू ने अपनी प्रतिनिधी समकालीन कविताओं का पाठ कर दमदार उपस्थिती दर्ज कराई. तृतीय एवं समापन सत्र में छत्तीसगढ़ के नासिर अहमद सिंकन्दर की अध्यक्षता में तथा प्रो. विजय अग्रवाल के संचालन में सुश्री प्रज्ञा रावत, प्रेमशंकर शुक्ला, सुश्री अर्चना भैसारे, श्रीमति ऊषा प्रारब्ध एवं कुमार सुरेश ने काव्य पाठ किया. महेन्द्र गगन ने “प्रश्न भी तुम्हारे उत्तर भी तुम्हारे” जैसी कविताओं से हमने सदियों से नदियों को पाप दिये और पुण्य कमाया, पर्यावरण पर आधारित कविता के साथ काव्य पाठ किया वहीं सुश्री प्रज्ञा रावत ने स्त्रियों पर रचना पढ़ते हुए , वो घर में और उसके आसपास रह रही सारी चीजों को बजाती रहती है, खो रही है रसोई की महक के साथ बाजारबाद के कारण हावी होते फास्ट-फूड की ओर इशारा किया. और “ईमानदारी निहत्थी ही अच्छी लगती है”. के साथ काव्यपाठ पूरा किया गया. छत्तीसगढ़ से पधारे निसार अहमद ने पढ़ा, था समय के साथ संकट, संकट के साथ समय, इनके बीच कही में चुनौती था. छत्तीसगढ़ से कमलेश्वर साहू की कविता, चाँदी, ने लोगों की वाहवाही बटोरी उन्होने पढ़ा, उनके घरों में बसने वाले ईश्वर भी होते है चांदी के, ओम भारती ने पिता को याद करते हुए पढ़ा, वे थे तो सब कुछ था रिस्ते समझ आ जाते थे एक दम्भ था सिर पर उनके तने होन का, और समाज में आयी बौद्घिक गिरावट को उन्होने कुछ युं व्यक्त किया, मेरी अपनी दी हुई किताब बीरगती पा जाती थी.

पूर्णचंद्र रथ ने संचालन करते हुए कुछ महत्वपूर्ण रचनाओं का पाठ कर समारोह को उंचाईयां दी. प्रेमशंकर रघुवंशी ने अध्यक्षता करते हुए प्रथम सत्र में पढ़ा, ताक में रखा है बाबा का लोटा और लोटे के पीछे छिपकली जाती है बाबा के पानी पीने का ढंग, प्रेम कविता के रूप में उन्होने गया सांसों का संगम देखा, देखा अधरों का मिलन, इस प्रथम सत्र में अभार प्रदर्शन मुकेश वर्मा द्वारा किया गया तथा द्वितीय सत्र में सुश्री अर्चना भैंसारे, हरदा की कविताओं में जोड़ तोड़ की भाषायें भी नहीं आती मुझे, और बड़े सभ्रन्त लोग प्याले में छोड़ देते है थोड़ी सी चाय, जैसी गंभीर पंक्तियों ने सभा का ध्यान आकर्षित किया. कार्यक्रम में साहित्यिक संस्थाओं के प्रतिनिधी और शायर कविगण मौजूद थे.

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