मध्यप्रदेश के नगरीय चुनाव अगले वर्ष 2013 में होने जा रहे विधानसभा के आम चुनाव के संदर्भ में राज्य की दोनों सत्तान्मुख पार्टियों भारतीय जनता पार्टी व कांग्रेस के लिए उत्साह व निरुत्साह का स्पष्ट संकेत लेकर आए हैं. चुनाव गणित व अनुमानों में यह मान्यता भी है कि स्थानीय चुनावों में पार्टी से ज्यादा उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि व प्रभाव काम करता है लेकिन पार्टी की भी अपनी अहमियत होती है.

इस बार के नगरीय चुनाव विधानसभा के कई उपचुनावों के अनुरूप ही सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में और विपक्ष की कांग्रेस के विरुद्ध गए हैं. निश्चित ही यह कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है. वे 10 साल पहले सत्ता से उखड़े थे लेकिन अभी तक अपनी स्थिति संभाल नहीं पाए हैं. राज्य के आदिवासी बाहुल्य स्वरूप को देखते हुए श्री कांतिलाल भूरिया को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. लेकिन उन

के गृह जिला व नगर झाबुआ में भी स्थिति बहुत विषम रही. भाजपा ने वहां कांग्रेस को मात दे दी.

नगरीय चुनावों के पहले दौर में भारतीय जनता पार्टी ने 27 में से 20 पर कब्जा जमाया. दूसरे दौर में भी भाजपा आगे ही बनी रही. न सिर्फ पार्टी अध्यक्ष श्री कांतिलाल भूरिया बल्कि केंद्रीय मंत्री श्री कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और नेता विपक्ष श्री अजय सिंह के क्षेत्रों में भी कांग्रेस पराजित रही. भाजपा पर खनन भ्रष्टïचार का मामला कर्नाटक से शुरू होकर मध्यप्रदेश तक आया और कांग्रेस ने इसे पूरी तरह गर्मा भी दिया. कई भाजपा नेता इसमें लिप्त पाये गये हैं. लेकिन इसका असर नगरीय चुनावों में स्थानीय प्रभाव की भूमिका संभवत: नहीं हो पाया. पार्टी इसे विधानसभा तक चलायेगी. वही भाजपा में विजय का मनोबल बन चुका है.

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