नई दिल्ली, 27 सितंबर. प्राकृतिक संसाधानों की नीलामी पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अपना अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि प्राकृतिक संसाधनों की नीलामी जरूरी नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस फैसले का असर 2जी के आदेश पर नहीं होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि नीलामी से आय बढ़ सकती है लेकिन जनहित सबसे पहले है. अदालत ने कहा कि सिर्फ नीलामी ही रास्ता नहीं है. कोर्ट ने कहा कि नीतियां बनाना सरकार के विवेक पर है. 5 जजों की संविधान पीठ ने यह फैसला सुनाया. इससे पहले के घटनाक्रम में प्रेसीडेंशियल रेफरेंस 12 अप्रैल को दाखिल किया गया था और सुनवाई 11 मई को शुरू की गई थी. रेफरेंस में 12 सवाल उठाए गए थे और इनमें सरकार इस मुद्दे पर अदालत की राय जानना चाहती थी कि क्या आवंटन योग्य प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन सिर्फ नीलामी के जरिए ही किया जाना चाहिए. रेफरेंस में पूछा गया कि क्या प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन के लिए नीलामी का रास्ता सर्वोच्च न्यायालय के पुराने आदेशों के प्रतिकूल नहीं होगा.

रेफरेंस 2जी फैसले के बाद दाखिल किया गया था, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि स्पेक्ट्रम जैसे दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनों को राज्य द्वारा आवंटन करना हो, तो पारदर्शी सार्वजनिक नीलामी एकमात्र वैध तरीका है. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पहले आओ, पहले पाओ की नीति दोषपूर्ण है और उसने 122 लाइसेंस रद्द कर दिए थे. न्यायालय की इस व्यवस्था के बाद ही सरकार ने 12 अप्रैल को राष्ट्रपति के माध्यम से आठ सवालों पर संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत शीर्ष अदालत से राय मांगी थी. इसमें यह सवाल भी था कि क्या प्राकृतिक संसाधनों और द्विपक्षीय तथा बहुपक्षीय समझौतों के तहत विदेशी निवेशकों द्वारा निवेश नीतिगत मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप हो सकता है.

खान समझकर न करें प्रताडि़त

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गुजरात से जुड़े एक आतंकवाद के मामले की सुनवाई करते हुए जांच एजेंसियों पर बेहद तीखी टिप्पणी की है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए प्रताडि़त नहीं किया जाना चाहिए कि उसका संबंध किसी विशेष धर्म से है. सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात में आतंकवाद के एक मामले में दोषी करार दिए 11 लोगों को बरी करते हुए यह टिप्पणी की. कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में फिल्म माय नेम इज खान का भी जिक्र किया. कोर्ट द्वारा बरी किए गए सभी लोग पिछले 18 वर्षो से जेल में थे. जस्टिस एचएल दत्ता और सीके प्रसाद की खंडपीठ ने ये फैसला सुनाया.

सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर इन लोगों को बरी कर दिया कि राज्य में टाडा के सेक्शन 20-ए (1) का पालन नहीं किया गया था जिसके तहत एफआईआर दर्ज करने से पहले जिला पुलिस अधीक्षक की अनुमति अनिवार्य है. वर्ष 2002 में टाडा (आतंकवाद और विध्वंसकारी गतिविधि रोकथाम कानून) की विशेष अदालत ने इन लोगों को 1994 में गुजरात के अहमदाबाद में भगवान जगन्नाथ पुरी यात्रा के दौरान कथित तौर पर साप्रदायिक हिंसा की साजिश रचने का दोषी करार दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस बल के अधिकारियों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जिला पुलिस अधीक्षक, महानिरीक्षक और अन्य अधिकारियों को ये जिम्मेदारी दी गई है कि वो कानून का किसी भी तरह से दुरुपयोग न होने दें. इस बात को सुनिश्चित किया जाए कि किसी निर्दोष व्यक्ति को ये नहीं लगना चाहिए कि उसे माय नेम इज खान बट आई एम नॉट टेरेरिस्ट की वजह से सताया जा रहा है. इन लोगों को टाडा कानून और भारतीय दंड संहिता की अन्य धाराओं के तहत पाच साल जेल की सजा सुनाई गई थी. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उन दोषी ठहराए गए लोगों को भी फायदा मिलेगा जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट मं अपील नहीं की है. अदालत ने दोषी करार दिए गए लोगों की सजा बढ़ाने के लिए राज्य सरकार की ओर से की गई अपील को भी खारिज कर दिया.

सरकार की नीति का समर्थन : सिब्बल

केंद्रीय टेलीकॉम मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन को लेकर सुप्रीम कोर्ट की राय सरकार की नीति का समर्थन करती है. प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन से जुड़े सुको के फैसले के तुरंत बाद सिब्बल ने  कहा कि अदालत ने वही कहा है जो वे पहले से कहते आ रहे हैं. गुरुवार को प्राकृतिक संसाधनों पर सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति को जो राय दी है उसके मुताबिक प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन के लिए नीलामी ही एक विकल्प नहीं है.

कोर्ट के मुताबिक प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन करना एक नीतिगत फैसला है और आवंटन करने के पीछे सामाजिक कल्याण का मकसद होना चाहिए, न कि ज्यादा से ज्यादा मुनाफा पाना. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे किसी आवंटन की समीक्षा का अधिकार कोर्ट के पास रहेगा. सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तारीफ करते हुए सिब्बल ने कहा कि अदालत के इस ताज़ा फैसले से प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन को लेकर संवैधानिक स्पष्टता आ गई है. सिब्बल ने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने सरकार की नीति का समर्थन किया है.

12वीं पंचवर्षीय योजना ‘जल योजना’

कार्यकारिणी में माना गया शिवराज का सुझाव
भारतीय जनता पार्टी की सूरजकुंड में चल रही राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा दिए गए 12 वीं पंचवर्षीय योजना को जल योजना के रूप में लिये जाने संबंधी सुझाव को एजेंडें शामिल कर लिया गया है. भाजपा के प्रवक्ता प्रकाश जावेडकर ने बैठक के उद्घाटन सत्र के बाद कल मीडिया को बताया कि मध्यप्रदेश ने सिंचाई योजनाओं का निर्माण पूर्ण करने पर विशेष ध्यान केन्द्रित कर सराहनीय कार्य किया है.

मुख्यमंत्री श्री चौहान की इस पहल के परिणाम स्वरूप प्रदेश ने सिंचाई क्षमता और फसल का रकबा बढा है. उन्होंने कहा कि इससे प्रदेश में गेहूं उत्पादन में इस वर्ष उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. वही दूसरी तरफ केन्द्र सरकार ने मध्यप्रदेश को समय पर बारदाने उपलब्ध नही करवाये. उन्होंने बताया कि पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उद्घाटन भाषण में मध्यप्रदेश द्वारा प्राप्त की गई उल्लेखनीय विकास और कृषि विकास दर का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि देश में सबसे ज्यादा विकास दर 10 राज्यों ने प्राप्त की है जिसमें नौ राज्यों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन .राजग.शासित सरकार है.

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