रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति के दुष्परिणाम एक लंबे समय से आना शुरू हो गये हैं. औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर लगातार घटती जा रही है. प्रगति के सूचक कार, ट्रक व आवासीय मकानों की बिक्री अब डिस्काउंट पर आ गई है. कारों में लाखों रुपए के डिस्काउंट और मकान व प्लाट खरीदने पर सोने के सिक्कों व कीमत घटाने के आफर आने लगे है. घरेलू विद्युत उपकरणों का उठाव लगभग ठप्प सा हो गया है. उद्योगों में सब जगह पूंजी अवरोध हो गया है.

इसका एक और जबरदस्त दुष्परिणाम अब पूरे समाज के सामने यह आया है कि रोजगार के अवसरों में 21 प्रतिशत की गिरावट आ गई है. जितने लोग रोजगार के लिये तैयार है और नये लोग आ रहे है, उस अनुपात में रोजगार के अवसर निर्मित नहीं हो रहे हैं. सड़कों पर महिलाओं की चेक खींचने या सड़कों पर लूटमार करने वाले अधिकांश युवा वर्ग है और मोटर बाइक अपराध का वाहन बन गया है. इनमें ऐसे लोग भी है जो आदतन अपराधी है और केवल यही उनका धंधा है. महंगाई के कारण आम लोग अपनी भोजन, आवास की जरूरतों में इतना खर्च कर रहा है कि उसे कोई बचत हो ही नहीं रही है.

भारतीय स्टेट बैंक ने अपने एक अध्ययन आंकलन में यह पाया है कि बैंक का कर्ज न चुका पाने का प्रतिशत बढ़ कर 5 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गया है और इससे वृद्धि हो रही है. इसका कारण भी यही आया है कि महंगाई के कारण लोगों का घरेलू बजट अस्त-व्यस्त हो गया है. बैंक ने तो यह उम्मीद जताई है यह अस्थाई दौर है जो आगे चलकर ठीक हो जायेगा.
लेकिन बैंक की इस आशा का आधार काल्पनिक ही लगता है क्योंकि रिजर्व बैंक एक तरफ तो यह कह रहा है कि जब तक मूल्य वृद्घि और मुद्रास्फीति कम नहीं होगी वह ब्याज दरें नहीं घटायेगा, इसी बात से यह भी जाहिर हो जाता है कि अभी न मूल्य वृद्घि रुक रही है और न ही मुद्रास्फीति घट रही है. मुद्रा अभाव हो जाने से उद्योगों में वस्तुओं का निर्माण घट गया है.

माल का उठाव न होने से स्टाक जमा हो गया. इसी समय उद्योग जगत अपनी रुक गई पूंजी निकालने के लिये डिस्काउंट सेल का सहारा ले रहा है. बाजार में बिस्कुट, साबुन, पेस्ट व अन्य सभी वस्तुओं की पिछली पैकिंग के मुकाबले इन दिनों की नई पैकिंग में सभी वस्तुओं का वजन घटाकर महंगाई बढ़ रही है और अपना माल बेच रहे हैं. जहां कीमतों में डिस्काउंट दिखाते हैं वहीं वस्तुओं के वजन में डिस्काउंट लगा देते हैं. उपभोक्ता बाजार इन दिनों कुछ अजीब ढंग से चलने लगा है. बाजार में टिके रहने के लिये नये-नये तरीके निकाले जा
रहे हैं.

यह भी एक विचित्र स्थिति है कि केंद्रीय वित्त मंंत्री श्री चिदम्बरम तो यह कह रहे हैं कि औद्योगिक उत्थान के लिये बैंक दरों का कम होना और सस्ती दरों पर पूंजी मिलना बहुत जरूरी हो गया है, लेकिन वित्त मंत्रालय की ही विभागीय संस्था रिजर्व बैंक लगातार बैंक दरों को घटाने से इंकार कर केवल सी.आर.आर. की बहुत मामूली तौर पर 0.25 पाउंड घटाकर बैंकों में तो पूंजी बढ़ा देता है, लेकिन महंगी दरों पर उनका लेवाल व उठाव
नहीं है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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