राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी का गणतंत्र दिवस पर राष्ट्र के नाम प्रथम संबोधन में दिल्ली जघन्य कांड और उससे उपजा युवा आक्रोश उनके भाषण व भावनाओं पर छाया रहा. साथ ही उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार को आर्थिक सुधार के नाम पर अंधी दौड़ से बचने की सलाह व चेतावनी दे डाली.

दिल्ली कांड को राष्ट्र को झकझोरने की व्यथा व्यक्त करते हुए राष्ट्रपति ने कहा इस मामले को युवाओं के गुस्से और क्षोभ को देश भर में महसूस किया गया है. आज युवा क्षुब्ध है. अब वह समय आ गया है कि हर भारतीय महिला के लिये समानता सुनिश्चित की जाए. इसे नजरअंदाज करने की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है. हमने एक जान से भी ज्यादा बहुत कुछ खोया है. एक सपना खो दिया. अब देश को महिलाओं के प्रति इस दायित्व को निभाना ही पड़ेगा. न तो इससे बचा जा सकता है और न ही छोड़ा जा सकता है.

पिछले कई वर्षों से केन्द्र की मनमोहन सिंह सरकार ने आर्थिक सुधार के नाम पर लगभग सभी वस्तुओं के मूल्य बढ़ाने की मुहीम चला रखी है. हर मूल्यवृद्धि को आर्थिक सुधार, अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी करार दिया जा रहा है. राष्टï्रपति ने इस ‘सुधार’ के नाम पर इसके जाल में फंसने के विरुद्ध सरकार को चेतावनी दी है. सरकार को समग्र विकास को देखना होगा. इस समय सरकार सब्सिडी घटाओ व खत्म करो की अंधी दौड़ में सरकार के वित्तीय घाटे को पूरा करने के जाल में फंसी पड़ी है. सरकार के खर्चों की जवाबदेही होनी चाहिए. सरकार का यह सुझाव स्वागत योग्य है कि जो ज्यादा अमीर हैं उनको टैक्स ज्यादा देना चाहिए. लेकिन सार्वजनिक धन का दुरुपयोग भी नहीं होना चाहिए. उसकी जवाबदेही निर्धारित हो.

नैतिक जीवन पर भ्रष्टïचार हावी हो चुका है. इसे रोकना बहुत ही जरूरी है. नैतिक दिशा को फिर से निर्धारित करना होगा. चुने हुए प्रतिनिधियों को जनता का विश्वास जीतना होगा. युवाओं में चिंता और अधीरता आ गई है. उसे परिवर्तित करने के लिये उन्हें रोजगार व अन्य अवसर उपलब्ध होने चाहिए. चुनी हुई विधायिकाओं के प्रतिनिधि को यह आत्मविश्लेषण करना होगा कि क्या वे उभरते भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं. इस समय राष्ट को यह अहसास है कि संसद व विधानसभाओं में ऐसे लगभग 80-90 प्रतिनिधि मौजूद है जिन पर महिला उत्पीडऩ के मामले चल रहे है. कई सांसदों की सदस्यता भ्रष्टाचार के कारण खत्म भी की गई थी. अब आर्थिक सुधार केवल सरकार का ही नहीं बल्कि आम लोगों का भी आर्थिक सुधार होना चाहिए. केवल सरकार के सामने ही वित्तीय घाटा को पूरा करने की चिंता नहीं है. मूल्यों की लगातार वृद्धि से हर आम आदमी वित्तीय घाटे में चल रहा है.

सरकार को वित्तीय घाटा घटाने के लिये मूल्य वृद्धि करनी है और आम जनता को उसका वित्तीय घाटा पूरा करने के लिये मूल्यों को घटाना होगा. इसमें सरकार को कहीं आर्थिक संतुलन करना होगा. जनतंत्र और गणतंत्र में सरकार और आम आदमी अलग-अलग नहीं होते हैं. अब राजा-प्रजा का दौर खत्म हो चुका है. अब राजा ”अन्नदाता” नहीं बल्कि किसान अन्नदाता बन गया है. राष्टपति ने आह्वïन किया है कि लोगों को यह विश्वास होना चाहिए कि शासन उनका है और उनकी भलाई का
माध्यम है.
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प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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