कभी मध्यप्रदेश के दो जिले बालाघाट और मंडला नक्सली प्रभावित रहे हैं. यहां विशेष अभियान के लिये राज्य की पुलिस को केन्द्र सरकार से कई वर्षों तक विशेष सहायता अनुदान भी मिलता रहा. कुछ अर्से बाद इस अभियान को सफलता मिली और इन जिलों को नक्सली प्रभाव से मुक्त माना गया और विशेष केन्द्रीय अनुदान भी बन्द हो गया.

इसका एक कारण यह भी रहा कि वे छत्तीसगढ़ के दक्षिणी जिलों दंतेवाड़ा, कांकर, बस्तर और महाराष्ट्र के गढ़चिरोली में सक्रिय हो गये. इन इलाकों में बड़ी कार्यवाही करने के बाद ये अभी भी बालाघाट व विन्ध्य अंचल के सीधी, सिंगरौली में आकर कुछ समय बिताते हैं इसलिए यह जरूरी हो गया है कि मध्यप्रदेश के इन जिलों में भी हमेशा सतत निगरानी होती रहनी चाहिए कि ये यहां आने व ठहरने न पायें.

बालाघाट में इनके फिर से सक्रिय होने की खबरें आ रही हैं. इनका एक संगठन ‘पिलगा’ (पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी) यहां अन्दुरुनी इलाके में सक्रिय हो रहा है. लांजी क्षेत्र के गांवों में इस संगठन ने अपने पम्पलेट बांटे हैं. लगभग 25 वर्ष पूर्व पश्चिम बंगाल के आदिवासी गांव नक्सलबाड़ी में आदिवासियों के स्थानीय हिंसक प्रदर्शन पर पुलिस गोलीबारी के प्रतिक्रिया में यह संगठन बनाया गया. प्रारंभ में यह पश्चिम बंगाल का ही हिंसक आंदोलन माना गया. लेकिन धीरे-धीरे यह अन्य राज्यों में भी फैलता हुआ बिहार, वर्तमान झारखंड, ओडिसा, आंध्र व दक्षिणी मध्यप्रदेश अब वर्तमान छत्तीसगढ़ व पूर्वी महाराष्ट्र तक फैल गया. अब इस बेल्ट को लाल गलियारा (रेड कोरीडोर) कहा जाता है. यहां इनकी समानान्तर आर्मी व सरकार चलती है. ये लोग बड़ी-बड़ी कम्पनियों से यहां काम करने देने के लिये लाखों रुपये की नियमित फिरौती वसूलते हैं. हाल ही में इस्सार जैसी कम्पनी को इन्हें 16 लाख रुपयों की फिरौती देते पकड़ा गया. नक्सल कानून व्यवस्था का प्रश्र नहीं रहे हैं बल्कि विद्रोह, फौज वाले समानान्तर सरकार बन चुके हैं. मध्यप्रदेश के नक्सल प्रभावित दो जिलों से इन्हें सफलतापूर्वक खदेड़ा जा चुका है और पूरी सावधानी बरतनी चाहिए कि ये फिर से यहां न आ सकें. भोपाल में यह बड़ी खामोशी से अपनी हथियार फैक्ट्री चलाते पकड़े गये हैं. इनके ऐसे अड्डो का और सघनता से पता किया जाना चाहिए.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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