भारतीय वायुसेना में शीघ्र ही एक बहुत बड़ी खरीद में नये फाइटर प्लेन शामिल किये जा रहे हैं. यह बताया गया है कि अब जितने भी रक्षा सौदे हुए हैं यह उनमें सबसे बड़ा कई बिलियन डालर का होगा. इसके लिए कई देश भारत के साथ यह सौदा पाना चाहते थे. लेकिन भारत की वायुसेना में कई देशों के प्रस्तावों में से यूरोपीय कन्सोरटियम के ”यूरो फाइटर” और ”रॉफेल” को पसंद किया है. इन दोनों में से किसी एक से सौदा शीघ्र ही तय होने जा रहा है. इसके लिए अमेरिकी कंपनी लोकहीड मार्टिन एंड बोइंग, रूस का मिग 35 और स्वीडन के शाबग्रिफेन को लिस्ट में नहीं लिया है.

भारत के रक्षा सौदे बहुत ही बड़े बजट के होते हैं. भारत सशस्त्र सेनाओं के मामले में विश्व में चौथे स्थान पर है. विश्व के लगभग सभी विकसित देशों के हथियार, विमान, युद्ध पोत बनाने वाले कारखाने निजी क्षेत्र में है. इससे वे तो रक्षा के मामले में आत्मनिर्भर होते हैं साथ ही अन्य ऐसे राष्ट्रों से व्यापार व उसके साथ-साथ उससे जुड़ी राजनीति भी कर लेते है. हमें अपने हर मामले में यह तो नहीं देखना चाहिए उस क्षेत्र में चीन ने क्या किया या कर रहा है. हमें अपना विकास अपनी जरूरतों के हिसाब से करना चाहिए.

चीन भी एक अर्से तक कम्युनिस्ट राष्ट्र होने के नाते रूस में ही अपनी सेनाओं की हथियार व उपकरणों की जरूरत पूरी कर रहा था. लेकिन अब उसने अपने अन्य उद्योगों के साथ फौजी साजो-सामान उद्योगों को भी विकसित कर लिया है. भारत को भी इस दिशा में आगे तेजी से बढऩा चाहिए कि भारत में उसकी सभी रक्षा संबंधी साजो-सामान के कारखाने, देश में ही  होने चाहिए. इससे भारत के निजी उद्योगपतियों को भी शामिल किया जाए. जाहिर है वे उसी तरह का उत्पादन करेंगे जो फौजों द्वारा मांगा जायेगा. इससे उन्हें सुनिश्चित बाजार मिलेगा और देश में तकनीकी रोजगार के बहुत सारे अवसर खुल जायेंगे.

भारत की रक्षा अकादमियों में अभी भी कई देशों के सैनिकों, नेपाल, इंडोनेशिया, श्रीलंका कई आफ्रीकी देशों के लोगों को फौजी ट्रेनिंग देता है. अभी हाल ही में दिल्ली में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति श्री हमीद करजई से जो समझौते हुए हैं उसमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भारत अफगानिस्तान की फौजों को ट्रेनिंग देगा और वहां फौजों की व्यवस्था को स्थापित करने में सहयोग करेगा. इससे पूर्व भी भारत ने मलेशिया की फौजों की स्थापना में सहयोग दिया था. ऐसे राष्ट्रों को फौजी हथियार व अन्य उपकरण भी लगते है, जिन्हें वे यूरोपीय देशों से खरीदते है. भारत के लिये ये देश बिल्कुल तैयार बाजार बने खड़े है. लेकिन हम खुद ही अपनी जरूरतें दूसरे देशों से ले रहे हैं. यदि भारत अपने यहां रक्षा उद्योगों को पूरी तरह विकसित कर लेता है तो उसके पास खरीददार राष्ट्रों की भीड़ लग जायेगी. संभवत: चीन इस बाजार को पाने की तैयारी में काफी आगे आ रहा है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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