मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के भग्नावेषों ने भी यह सिद्ध कर दिया कि भारत तब से लेकर आज तक एक महान सभ्यता और संस्कृति है. लेकिन इस महानता में भी खुले में शौच जाने की असभ्यता और कुसंस्कृति भी तब से लेकर आज तक चली आ रही है.

भारत में पर्यावरण सुधारने व बनाने की करोड़ों-अरबों रुपयों की कई योजनाएं भी चल रही हैं. झुग्गी बस्तियों से देश की राजधानी दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुम्बई के साथ सभी अन्य महानगर व बड़े नगर भी ‘महानÓ शौचालय बने हुए हैं. कितनी ही सभ्यता संस्कृति की बात की जाए और पर्यावरण के प्रयत्न किए जाएं जब तक देश में यह खुले शौच की प्रथा खत्म नहीं होगी सब तरफ असभ्यता व पर्यावरण का विनाश ही नजर आता रहेगा. लेकिन इस दिशा में प्रयास भी काफी हो चुके हैं और अभियान जारी भी हैं. लेकिन अभी हाल ही में दिल्ली के योजना भवन के टायलेटों के बारे में योजना उपाध्यक्ष श्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने जो भी कहा वह सामाजिक अपराध सब जगह हो रहा है. जो भी सार्वजनिक शौचालय बनाये जाते हैं वे इतने गंदे कर दिये जाते हैं कि कोई उनमें जा नहीं सकता और उन्हें न जाने क्यों तोड़-फोड़ दिया जाता है. यह योजना भवन तक में होता है, ट्रेनों में भी यही होता है. सरकार ने एक अरसे से ग्रामीण अंचलों में भी यह कार्यक्रम चला रखा है कि सभी लोग शौचालय बनाएं. इसके लिए अनुदान भी दिये जा रहे हैं. लेकिन यह समस्या जितनी विशाल और व्यापक है उस हिसाब से इस कार्यक्रम में गति नहीं आ रही है.

लेकिन अब इस दिशा में एक बड़ी पहल यह हुई है कि केंद्र सरकार ने ‘निर्मल भारतÓ अभियान को 7 जून को मंजूरी दी. इसके तहत 10 साल की अवधि में देश की दो लाख 40 हजार ग्राम पंचायतों को स्वच्छ बनाया जाएगा. इसके तहत ग्राम पंचायतें सभी के लिये शौचालयों का निर्माण करायेंगी. लेकिन इसकी भी निगरानी करनी पड़ेगी कि ग्रामीण लोग उसका इस्तेमाल भी करे. शौचालय बना देने के बाद भी उनकी खुले में जाने की आदत नहीं छूट रही है. वे शौचालयों का इस्तेमाल भी सामान भरने के लिये करने लगे है. देश की ग्रामीण व नगरीय दोनों प्रकार की आबादी का 70 प्रतिशत भाग आज भी खुले में शौच के लिये जाता है. यह सदियों पुरानी आदत देश का सबसे बड़ा कलंक बनी हुई है. पूरा देश गंदगी में पड़ा हुआ है. अभी राज्यों को प्रत्येक शौचालय के लिये साढ़े तीन हजार रुपए दिये जाते है. कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इसके लिये 10 हजार प्रति शौचालय की मांग की है.

भारत की धार्मिक मान्यताओं में यह भी है कि जहां गंदगी रहती है वहां दारिद्रय ही रहेगा. वहां लक्ष्मी आती ही नहीं है. लेकिन यह धारणा केवल दिवाली के अवसर पर ही दिखाई देती है. वह भी इस रूप में कि अपने घर का कचरा दूसरी जगह फेंक दिया जाए. गंदगी व कचरा केवल यहां से वहां हो जाता है. दिवाली के बाद फिर वही हाल रहता है. धार्मिक आस्था में यही माना जा सकता है कि यह देश संभवत: इसलिए गरीब है कि यहां गंदगी बहुत है और लक्ष्मी ऐसे में आती ही नहीं है. यह भी एक आश्चर्य का विषय है कि इस धर्म प्रधान देश के लोगों में धार्मिक भावना के रूप में भी यह भावना व प्रवृत्ति क्यों नहीं बनी कि घर, परिवार, मोहल्ला, गांव व शहर हमेशा स्वच्छ रहे. शायद भारत सरकार की ‘निर्मल भारतÓ योजना से देश में कोई नया वातावरण बने. फिर यह यक्ष प्रश्न बना ही रहता है कि क्या यह भी सरकार का काम है कि हम साफ सुथरे रहे. भारत में शौचालय प्रथा प्रणाली जम जाये तो 90 प्रतिशत पर्यावरण खुद ही सुधर जायेगा.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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