नई दिल्ली,16 अक्टूबर. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश के. टी. थॉमस का कहना है कि मृत्युदंड न्यायिक हत्या है। थॉमस की अध्यक्षता वाली न्यायाधीशों की खंडपीठ ने राजीव गांधी की हत्या की साजिश रचने वाले तीन व्यक्तियों को सजा-ए-मौत सुनाई थी।

थॉमस [74] ने केरल के कोट्टायम से फोन पर विशेष बातचीत में कहा मृत्युदंड कोई दंड नहीं है। यह न्यायिक हत्या है, जिसे सामाजिक सुरक्षा के साथ अंजाम दिया जाता है। थॉमस के अनुसार, मृत्युदंड के खिलाफ दुनिया की राय बदल रही है और अधिक से अधिक देश अपने यहां मृत्युदंड समाप्त कर रहे हैं। थॉमस ने कहा भारत में भी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, न्यायिक हलकों, और नागरिक समाज में यह बहस जारी है। लेकिन अंततोगत्वा यह एक राजनीतिक निर्णय है।

यदि थॉमस मृत्युदंड के खिलाफ हैं तो उन्होंने राजीव के तीन हत्यारों-मुरुगन, सनथन, और पेरारिवलन को मृत्युदंड क्यों सुनाया? इसके जवाब में थॉमस ने कहा, इसलिए क्योंकि मैंने संविधान और प्रचलित कानूनों के अनुसार अपने कर्तव्य पालन की शपथ ली थी। मेरे व्यक्तिगत विचार चाहे जो भी हों, एक न्यायाधीश के रूप में मुझे मौजूदा कानूनों के अनुसार काम करना था। दंड के तीन उद्देश्य हैं सुधार, निवारण और प्रतिकार। प्रतिकार [दांत के बदले दांत, आंख के बदले आंख] का नियम व्यापक तौर पर असभ्य माना जाता है।

उन्होंने कहा, ‘उसके बाद सुधार की बात आती है। यदि किसी व्यक्ति को ही खत्म कर दिया गया, तो उसके सुधार का अवसर कहां बचता है? अनुभव और अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि मृत्युदंड, निवारण में भी कारगर नहीं है। थॉमस ने कोचीन और त्रावणकोर रियासतों का उदाहरण पेश किया। दोनों रियासतों ने 1940 में मृत्युदंड समाप्त कर दिया था, लेकिन 1950 में भारतीय गणराज्य में शामिल हो जाने के बाद फिर से मृत्युदंड बहाल हो गया। दस्तावेज बताते हैं कि 1950 के दशक में 1940 के दशक की बनिस्बत बहुत अधिक हत्याएं हुई थीं।  निवारण का सिद्धांत कई स्थानों और कालखंडों में सही नहीं साबित हुआ है। ज्ञात हो कि सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों की पीठ ने राजीव गांधी हत्या मामले में मुरुगन, सनथन, पेरारिवलन और मुरुगन की पत्??नी नलिनी को मृत्युदंड सुनाई थी। पीठ के न्यायाधीशों में थॉमस, न्यायमूर्ति डी.पी. वाधवा और न्यायमूर्ति एस.एस.एम. कादरी शामिल थे। थॉमस, नलिनी के मृत्युदंड के खिलाफ थे, जबकि बाकी दोनों न्यायाधीश सभी चारों के खिलाफ मृत्युदंड के पक्ष में थे। हालांकि बाद में नलिनी का मृत्युदंड आजीवन कारावास में बदल दिया गया, क्योंकि राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने उसकी दया

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