• हाईव्रिड बीजों से किसानों का हो रहा मोहभंग
  • परम्परागत खेती की ओर लौट रहे किसान

सेहत और स्वाद के लिहाज से परम्परागत खेती ही लाभदायी है. शंकर बीज और रासायनिक उर्वरक व कीटनाशक दवाइयों का उपयोग भूमि की उर्वरा शक्ति प्रभावित कर रहा है और तरह-तरह की बीमारियां भी फैल रही हैं. सेहत और स्वाद के लिहाज से किसानों को खेती का परम्परागत तरीका अपनाना चाहिए और रसायनिक उर्वरक के स्थान पर जैविक व गोबर की खाद का उपयोग करना चाहिए.

सतना 21 अक्टूबर.  यह मानना है सतना जिले के पिथौराबाद निवासी प्रगतिशील किसान बाबूलाल दाहिया का. वे न केवल परम्परागत खेती करते हैं बल्कि 70 प्रकार की देशी धानों को सहेजे हुए हैं. आज जब व्यापार संस्कृति की अन्धी दौड़ में किसान अपने परम्परागत अनाजों को पूरी तरह भूल चुका है. तब भी श्री दाहिया हर वर्ष 10 एकत्र भूमि में न सिर्फ 70 प्रकार की परम्परागत देशी धाने बल्कि विलुप्त प्राय: अन्य प्रकार के लोक अनाज कोदो, कुटकी, सांवा, काकुन, देशी ज्वार, कठिया गेंहू आदि उगा रहे हैं.

पहले किसान वह फसल उगाता था जिसे उसका खेत मांगता था पर अब वह उस फसल को उगा रहा है जिसे बाजार मांगता है. खेल की मांग हर वर्ष कम पानी भराव वाले ऊॅचे खेतों में सांवा, काकुन, कु टकी, ज्वार, कोदो, उड़द आदि की खेती होती थी. जहां कुछ समय तक ही पानी भरे वहाँ शीघ्र पकने वाली धान और जहां लम्बे समय तक पानी ठहरे वहॉ धान की देर से पकने वाली किस्में बोता था. फलस्वरूप कुओं का जल स्तर बहुत अच्छा रहता था. पर बाजार की मांग के अनुसार अब वह ऊँचाई वाले खेतों से लेकर उन तमाम खेतों में सोयाबीन को बोता है

जहां कभी धान की चिन्नौर, दिलवक्सा, जिलेदार आदि किस्मों की वालिया लहराया करती थी. और इतना ही नही बाद में वह इन खेतो में चार पांच सिंचाई से पकने वाले बौनी किस्म के गेंहू को बोकर, 4-5 सौ फीट गहरे तक का पानी भी निकाल लेता है जो वाद में जल संकट का कारण वनता है. और यदि खेतो में धान भी बोता है तो अधिक उर्वरक पचा कर विपुल उत्पादक देने वाली बौनी किस्मो को. श्री दाहिया अपनी देशी धानो और अन्य किसानों द्वारा उगाई जा रही बौनी किस्मों का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद बताया कि देशी धानें हजारो वर्ष से इस क्षेत्र में उगते उगते इस तरह क्षमता विकसित करली है कि कम पानी और विसम परिथिति में भी पक जॉय पर वाहर से आयातित बौनी किस्मों में वह गुण नही है. श्री दाहिया ने बताया कि हमारे क्षेत्र मे हर वर्ष 20-25 सितम्बर तक ही मानसूनी वर्षा होती है इसलिए देशी धानो ने अपने पेड़ो को कुछ लम्बा कर लिया था ताकि कुछ समय तक पानी को वे शरीर में ही संचित कर सकें. बाद में वाल आ जाने के पश्चात वे ओस में ही पक जाती हैं. पर बौनी किस्मे सीधे जमीन से पानी अवशोषित करती है. फल स्वरूप उनमे एक दो अधिक सिंचाई करना पड़ती है जो बाद मे जल संकट का कारण बनता है. उनने यह भी बताया कि बौनी  किस्म की धानो को अक्सर खर पतवार दवा लेते है. इसलिये कईवार निदाई करनी पड़ती है. पर देशी धानों की एक निदाई भी हो जाय तो बड़ा पौधा होने के कारण उसे खर पतवार नही दवा पाते.

कम लागत, लाभ अधिक
देशी धान में कम उर्वरक में भी अधिक अच्छी उपज देने की क्षमता होती है. इस कारण खेत की उर्वारा शक्ति भी हमेशा संतुलित रहती है. इसलिए एकोनामिक दृष्टिï से भी देशी धान की खेती विपुल उत्पादक किस्मों से लाभ मे अधिक कस नही हैं.
बाबूलाल दाहिया, प्रगतिशील किसान

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