सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के फै सले पर लगाई मोहर

नई दिल्ली, 12 अप्रैल. सुप्रीम कोर्ट ने राइट टु एजुकेशन कानून, 2009 ( शिक्षा का अधिकार ) को संवैधानिक रूप से वैध माना है. इससे देशभर के सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में गरीबों को 25त्न निशुल्क सीटें समान रूप से मिल सकेंगी. चीफ जस्टिस एस.एच. कपाडिय़ा, जस्टिस के.एस. राधाकृष्णन और जस्टिस स्वतंत्र कुमार की बेंच ने बहुमत से दिए फैसले में कहा कि कानून सरकारी और गैर-सहायता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों में समान रूप से लागू होगा. सरकारी सहायता नहीं लेने वाले प्राइवेट अल्पसंख्यक स्कूल ही इसके दायरे से बाहर होंगे.

जस्टिस राधाकृष्णन ने इससे असहमति जताते हुए राय जाहिर की कि यह कानून उन गैर-सहायता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों और अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू नहीं होगा, जो सरकार से कोई सहायता नहीं लेते. चीफ जस्टिस कपाडिय़ा और जस्टिस स्वतंत्र कुमार का फैसला जस्टिस राधाकृष्णन से अलग था. उन्होंने कहा कि कानून गैर-सहायता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों पर भी लागू होगा. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका फैसला आज से प्रभावी होगा. यानी पहले हुए दाखिलों पर यह लागू नहीं होगा. सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने पिछले साल 3 अगस्त को प्राइनेट स्कूलों द्वारा दाखिल याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था. न याचिकाओं में कहा गया था कि शिक्षा का अधिकार कानून निजी शैक्षणिक संस्थानों को अनुच्छेद 19 (1) जी के अंतर्गत दिए गए अधिकारों का उल्लंघन करता है , जिसमें निजी प्रबंधकों को सरकार के दखल के बिना अपने संस्थान चलाने की स्वायतत्ता प्रदान की गई है. मामले में लंबे समय तक चली जिरह के दौरान केंद्र ने कानून के पक्ष में दलीलें देते हुए कहा कि इसका उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के जीवन स्तर में सुधार लाना है.

केंद्र ने जोर देकर कहा कि समाज के विभिन्न वर्गों में योग्यता और प्रतिभा को सामाजिक और आर्थिक विभिन्नता से अलग रखा जाना चाहिए. यह कानून संविधान में अनुच्छेद 21 ( ए ) के प्रावधान के जरिए तैयार किया गया था , जो कहता है कि सरकार छह से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करे. याचिकाओं में दलील दी गई थी कि शिक्षा का अधिकार कानून असंवैधानिक है और बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन करता है. याचिकाकर्ताओं के अनुसार कानून की धारा -3 गैर – सहायता प्राप्त निजी और अल्पसंख्यक संस्थानों पर एक अनिवार्य बाध्यता लगाती है कि वह दाखिला लेने के लिए आने वाले आसपास के हर बच्चे को बिना किसी चयन प्रक्रिया के दाखिला दे.

फैसले से विवाद खत्म : सिब्बल

कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के शिक्षा का अधिकार कानून की संवैधानिक वैधता बरकरार रखने के आदेश पर खुशी जताई. सिब्बल ने कहा  इस फैसले ने स्पष्टता लाते हुए सभी विवादों को समाप्त कर दिया है.  अदालत में किसी मामले को कभी भी जीत या हार की तरह नहीं देखा जाना चाहिए, खासतौर पर तब जबकि सरकार इसमें शामिल हो क्योंकि सरकार इस याचिका के जरिए स्पष्टता चाहती है और इसका लाखों लोगों पर असर होता है. अदालत ने इस मुद्दे पर आज हमें स्पष्टता दी है ताकि सभी विवाद खत्म हो जाएं. जब विवाद समाप्त होते हैं, शिक्षा का हमारा नजरिया आगे बढ़ता है. इसलिए हम बहुत खुश हैं कि सभी विवाद समाप्त हो गए हैं और अब स्पष्टता है.

इंजीनियरिंग और एमबीए एक साथ

अब बारहवीं कक्षा के बाद छात्र प्रबंधन में बीए और एमए की दोहरी डिग्री एक कोर्स में ही प्राप्त कर सकेंगे. देश में पहली बार इस तरह का कोर्स शुरू हो रहा है. अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ने पांच साल का एमबीए कोर्स इस वर्ष से शुरू करने की घोषणा की है. इसके अलावा एक अलग कोर्स की भी घोषणा की गई जिसमें इंजीनियरिंग के छात्र भी अपनी पढाई के साथ ही एमबीए कर सकेंगे. शिक्षा के क्षेत्र में यह भी एक नया प्रयोग है. मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने बृहस्पतिवार को यहां इस कोर्स की जानकारी देते हुए पत्रकारों को बताया कि बारहवीं कक्षा के बाद एक अलग से प्रवेश परीक्षा होगी, इसके जरिये कोई छात्र पांच वर्षीय एमबीए की डिग्री कोर्स में दाखिला ले सकेगा. इस कोर्स के तहत तीन साल के बाद बीए प्रबंधन की डिग्री मिलेगी और इसके बाद एक वर्ष का एडवांस प्रबंधन कोर्स होगा एवं उसके लिए सर्टिफिकेट मिलेगा.

अगर कोई उसके बाद एक वर्ष और भी पढा़ई करेगा तो उसे एम बी ए की डिग्री मिलेगी. इस तरह हर छात्र को पांच वर्ष में दो डिग्री मिलेगी और अगर कोई छात्र बी ए के बाद या एडवांस कोर्स के बाद पढा़ई छोडऩा चाहता है तो वह उसके लिए स्वतंत्र होगा. इस कोर्स के लिए परीक्षा मई के तीसरे सप्ताह के बाद शुरू हो जाएगी. सिब्बल ने यह भी बताया कि बारहवीं कक्षा के बाद साढ़े पांच वर्ष का एक समन्वित एमबीए का भी कोर्स शुरू होगा. इस कोर्स के तहत कोई छात्र संयुक्त इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा (जेईई) या अखिल भारतीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा (एआईईईई) के जरिए समन्वित एमबीए की पढा़ई कर सकेगा. इसमें चार साल इंजीनियरिंग या आर्किटेक्चर की पढा़ई के बाद छह महीने का इर्न्टनशिप कम्पनियों तथा फैक्ट्रियों में होगा और उसके बाद एक साल की पढा़ई के बाद एम बी ए की डिग्री मिलेगी. उन्होंने बताया कि इन दोनों कोर्सो से छात्रों को रोजगार मिलेगा और बीए करने के बाद एमबीए के लिए कैट या मैट की परीक्षा नहीं देनी होगी. इससे छात्रों का तनाव और बोझ भी दूर होगा और वे बारहवीं के बाद ही निश्चित हो जाएंगे.

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