डीजल, रसोई गैस के बाद विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और इसके बाद इशारा बिजली की दरें बढ़ाने का भी कर दिया है. यह स्पष्ट ही नजर आ रहा है कि सरकार ने यह निश्चय कर लिया है कि एक ही हल्ले में जो भी करना है, कर लिया जाए. अगले लोकसभा चुनाव नवम्बर 2014 में है- अभी लगभग सवा दो साल का समय है- तब तक इन निर्णयों पर जो भी क्रिया और प्रतिक्रियायें होनी हैं वे भी हो जायेंगी. जैसे संसद सत्र के चलते ऐसी बड़ी घोषणाओं को रोककर रखा गया. उसी तरह चुनावों से पहले इन्हें किया जा रहा है. उस समय के आसपास सरकारी पक्ष राहत और रियायतों का पिटारा खोलता है.

इस बार भी सरकार और विपक्ष में उसी तरह की स्थिति बन रही है जैसी परमाणु करार के समय उसके विरोध में बनी थी. लगभग सभी विपक्षी पार्टियों ने अमेरिका के साथ उस करार का विरोध किया था. वामपंथी दलों ने तो सरकार से समर्थन वापस लेकर उसे गिराना चाहा, लेकिन समर्थन दे रही दूसरी पार्टियों- समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी व राष्ट्रीय जनता दल ने सदन में मतदान के समय करार पर मतदान के समय विरोध जताते हुए ‘वाक आउटÓ कर अपना विरोध भी जता दिया और उसे सरकार के खिलाफ वोट भी नहीं देना पड़ा. इससे सरकार भी बच गई.

इस बार भी सरकार में शामिल तृणमूल कांग्रेस ने सरकार को तीन दिन का अल्टीमेटम भी दे दिया और यह भी कह दिया कि वह सरकार को गिरने नहीं देगी. इसमें समर्थन व विरोध दोनों ही साथ-साथ है. ऐसी ही धमकी द्रमुक के करुणानिधि, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की ओर से मायावती ने दे दी है. 20 सितंबर को विरोध में भारतीय जनता पार्टी, वामपंथी पार्टियां बसपा, सपा, द्रमुक बीजद, जद यू, तेलगू देशम आदि 8 पार्टियां शामिल है. भारत बंद होगा. ओडिसा के मुख्यमंत्री श्री नवीन पटनायक ने कहा है कि एफ.डी.आई. पर अपने राज्य के नफे-नुकसान की दृष्टिï पर आगे विचार करेंगे.

एकाएक विरोध में उठे हल्ले से यह अंदेशा हो रहा था कि क्या सरकार खतरे में है. लेकिन वैसी संभावना एक दो दिन में ही केवल धमकियों तक ही सीमित दिख रही है. श्री आडवाणी और श्री बाल ठाकरे सरकार को समर्थन दे रही पार्टियों को समर्थन वापस लेने के लिये उकसा जरूर रहे हैं.  लेकिन पार्टियों के भी अपने-अपने राजनैतिक हित अलग होते हैं. श्री शरद पवार की राष्टï्रवादी कांग्रेस ने डीजल, रसोई गैस की मूल्य वृद्धि का विरोध किया और फिर खामोश हो गई.
लगातार एक के बाद बाद निर्णयों से यह राजनीति भी नजर आ रही है कि एक मुद्दे से  दूसरा मुद्दा दब जाता है. डीजल और रसोई गैस की बात पर एक एफ.डी.आई. छा गया है. इसकी भी संभावना है कि इस पर भी बिजली की दर का संभावित फैसला छा जाए. श्री मनमोहन सिंह ने एफ.डी.आई. फैसले के बाद ही यह कहा कि हम हमारे देश में बिजली की भारी कमी है, इसे इसका उत्पादन काफी बढ़ाना और इसके लिये मूल्य भी बढ़ाना होगा.

सरकार ने मल्टी ब्रांड किराना, सिंगल ब्रांड रिटेल, हवाई सेवा, केबिल व डी.टी.एच. में विदेशी निवेश खोला है और 4 सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश का फैसला लिया है. जिससे उसे 15 हजार करोड़ रुपए मिलेंगे. सरकार का यह अनुमान है कि रिटेल बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में तीन सालों में 16 बिलियन डालर की आय देश को होगी. और रोजगरों में 20 प्रतिशत का इजाफा होगा. जो अमेरिकी अखबार एफ.डी.आई. फैसला न होने के कारण प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह की कटु आलोचना व अशोभनीय भत्र्सना कर रहे है. वह गिरगिट की तरह फौरन अपना रंग बदलकर उनकी प्रशंसा करने लगे कि एफ.डी.आई. का फैसला पिछले 20 साल में आर्थिक सुधार की दिशा में सबसे बड़ा निर्णय है. प्रधानमंत्री इस फैसले से पहले और इसके बाद भी जैसे थे वैसे ही है. अब अमेरिका इसलिए बड़ा प्रसन्न है कि उसे भारत जैसा विशाल भू-भाग व जनसंख्या का बाजार मिल गया.

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