अमेरिकी राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा ने निवेश पर भारत को सुझाव दिये हैं वे वास्तव में उनकी अमेरिकी निवेश के लिये वहां की उद्योगपतियों की चिंता है.भारत की अर्थनीति में एक बड़ा व्यापक मुद्दा यह है कि देश के उद्योग व्यापार में विदेशियों को प्रत्यक्ष निवेश की अनुमति दी जाये या नहीं.

भारत में कार निर्माण में कुछ दशकों में जो एकाएक बहुत तेजी से देशी और विदेशी निर्माण व निवेश आया उससे दुनिया को यह जाहिर हो गया कि भारत में औद्योगिक विकास व निवेश बड़ी तेजी से हो रहा है. हाल ही वायुसेना के लिये फाईटर प्लेन के लिये फ्रांस में जो खरबों रुपये का जो बड़ा सौदा हुआ है उससे दुनिया अचंभे में आ गई कि भारत की आर्थिक स्थिति बहुत ही सक्षम्य है. इस सौदे के लिये हमारा काफी पुराना फौजी साजो सामान का सहयोगी रूस के अलावा यूरोप अपने यूरो फाईटर व अमेरिका भी अपने फाईटर प्लेन के लिये आतुर था, लेकिन फ्रांस इसे ले गया.

अमेरिका इसके हाथ से निकल जाने से काफी निराश हुआ. अमेरिका के उद्योगपति भारत से सभी क्षेत्रों में निवेश के लिये बहुत आतुर और टूटे पड़ रहे हैं. भारत एशिया की उभरती हुई आर्थिक शक्ति के अलावा उनका प्रजातंत्रीय होना दुनिया को बहुत आकर्षित करता है. इलेक्ट्रॉनिक्स मे जापान और दक्षिण कोरिया यहां पैर जमा चुके हैं. दोनों ने सुजुकी, यामाहा, होंडा, सोनी, सान्यो, सेमसंग से अपने को भारत में जमा लिया है. राष्ट्रपति निक्सन के भारत विरोधी शासन के समय से दोनों देशों के बीच व्यापार निवेश काफी कम हो गया. फौजी सप्लाई हमने रूस से प्रारंभ कर दी थी.

अमेरिका के लिये भारत में निवेश करना उसकी आर्थिक से ज्यादा राजनैतिक जरूरत है. यू.पी.ए. सरकार भी परस्पर संबंधों में अमेरिकी निवेश व व्यापार बढ़ाने के लिये इच्छुक हैं. मनमोहन सिंह सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति देने की घोषणा भी कर दी. सरकार के साथ-साथ भारत उद्योग जगत भी यह चाहता है कि यह भारत के आर्थिक हित में है कि यहां विदेशी निवेश तुरंत हो जाये, क्योंकि इस समय उभरती अर्थ व्यवस्थाओं में भारत और चीन ही सामने हैं. तीसरे नंबर पर भी दक्षिण पूर्व एशिया का इंडोनेशिया है. यदि भारत ने निवेश 'ब्लाक' रखा तो निश्चित ही यह चीन व इंडोनेशिया की तरफ चला जायेगा. निवेश व उद्योग एक बार जहां चले गये. फिर वहीं जम जाते हैं. यह भारत के लिये अच्छी स्थिति नहीं होगी. केंद्रीय स्तर पर साझा सरकार में सहयोगी सरकार की अडंग़ेबाजी केवल अपने राजनैतिक महत्व जताने के लिये कर रही है. उसी तारतम्य में वे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का भी भारी विरोध कर रही है.

साफ्ट वेयर व सूचना क्रांति में भारत निवेशकों के लिये 'डेस्टीनेशन” बन गया है. अमेरिका की सारी उच्च तकनीक की आऊट सोर्सिंग बंगलौर में हो रही है. अमेरिका भारत जैसे देश में रिटेल बाजार को ऐसा क्षेत्र पाता है, जहां वह भी भारत में जापान, कोरिया व फ्रांस की तरह अपनी खुद की पहचान बना सके. चाहे वह 'टाइम' मेगजीन की रिपोर्ट या अब बराक ओबामा की भारतीय अर्थव्यवस्था की तीखी आलोचना हो. भारत अब इस अवस्था में है कि वह अपनी आर्थिक नीति खुद तय करे और एशियाई क्षेत्र में उसका प्रभाव हो. अमेरिका रिटेल बाजार में आने से भारत की तरफ देर होने से काफी परेशान है. साथ उसे ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का आर्थिक संगठन 'ब्रिक्स' भी काफी चिंता का विषय बना हुआ है, क्योंकि ये पांचों देश आपस में उनकी खुद की मुद्राओं में व्यापार करेंगे और उसके 'डालर' का कोई रोल नहीं होगा.

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