अभी तक तो महंगाई की बात इस संदर्भ में होती रही कि बाजारों में खाद्यान्न व अन्य सभी बिकने वाली वस्तुओं के भाव बढ़ते जा रहे हैं. उस समय सरकार ने वास्तव में तो कुछ किया नहीं लेकिन झूठी तसल्ली हर समय लगातार देती रही कि सरकार भरसक प्रयास में लगी हुई है कि बढ़ते मूल्यों पर नियंत्रण पाया जा सके और जल्दी ही मूल्यों पर नियंत्रण हो जाएगा.

सरकार ने ऐसा कुछ किया ही नहीं और नतीजे में कुछ हुआ भी नहीं. इसके विपरीत केंद्रीय सरकार के कृषि मंत्री श्री शरद पवार लगातार ऐसे बयान जरूर देते रहे कि वस्तुओं का अभाव है जिससे लगातार भाव बढ़ते चले गये. जबकि सारे देश में खाद्यान्न की सभी वस्तुएं भरी पड़ी थी और कहीं भी अभाव नहीं दिखता था. साथ ही यह जरूर नजर आ रहा था कि देश में खाद्यान्नों की भरपूर व बम्पर फसले आ रही हैं. और सरकार गेहूं, चावल, शक्कर, प्याज आदि का निर्यात भी करती जा रही है. इस नीति के कारण भी देश में भाव बढ़ते गये.

लेकिन अब सरकार स्वयं रेल, बस, पेट्रोल, डीजल, बिजली की दरें व सभी वस्तुओं पर सर्विस टैक्स लगातार बढ़ाये जा रही है. इससे अब बाजार मूल्य वृद्धि के बाद सरकार मूल्य वृद्धि का दौर शुरू हो गया है. बाजार भावों में वृद्धि के समय तो सरकार यह तसल्ली देती रही कि मूल्यों  पर नियंत्रण की कोशिशें जारी हैं. लेकिन अब जब सरकार की अपनी दरों में सभी वस्तुओं व सुविधाओं तक वृद्धि करती जा रही है तो कोई यह कहने करने वाला नहीं है कि वह सरकार द्वारा इस वृद्धि को रोकने का प्रयास करेगा. दवाईयों के मामले में अब सुप्रीम कोर्ट ही रक्षक बन कर सामने आया है.

अब सरकार जो वृद्धि कर रही है उसे विकास की गति बढ़ाने के लिए वित्त पोषण और आर्थिक सुधारों का सुहाना नाम दिया जा रहा है जो किसी को भी सुहाना नहीं लग रहा. यह भी कहा गया कि देश का बुनियादी आर्थिक ढांचा ठीक करना है और हो यह रहा है कि देश के हर नागरिक का आर्थिक ढांचा और वह स्वयं भी ध्वस्त होता जा रहा है. जब तक ममता बनर्जी के सहारे से केंद्र सरकार चल रही थी तब तक रेल भाड़ा और रेल सेवा पर सर्विस टैक्स नहीं लगा पा रहे थे. उनके हटते ही वहां भाड़ा किराया वृद्धि कर दी गई और सर्विस टैक्स भी थोप दिया.

सरकार की हर चीज पर रेट वृद्धि के ऐसे त्रासदायी दौर में सुप्रीम कोर्ट ने बीमारों को काफी राहत पहुंचाई है. उसने सरकार को निर्देश दिया है कि वह दवाओं के भाव नहीं बढ़ाए. इसकी नीति में परिवर्तन नहीं करें. ऐसा किया गया तो दवाओं के भाव बढ़ जायेंगे. 13 जुलाई 1999 को दवाओं के जो मूल्य रखे गए थे उसमें बदलाव व बढ़ाना नहीं होना चाहिए. अभी मूल्य नियंत्रण में 78 दवाएं शामिल हैं और सरकार को इस सूची में और दवाएं जोडऩा है लेकिन सरकार उस पर चुप्पी साधे नौ साल से बैठी है और अभी तक कुछ नहीं किया. इस वजह से साधारण स्थिति का व्यक्ति दवाएं खरीद न पाने के कारण मरने को ही मजबूर है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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