इसे पाकिस्तान सरकार की पलटी कहें या भूल सुधार, लेकिन उससे भारत में उपजी खुशी आधी-अधूरी हो गई. एक अर्से से सरबजीत का मामला दोनों देशों के बीच उलझ रहा है. उस पर पाकिस्तान में आतंकी गतिविधि करने के आरोप में फांसी की सजा दी गई थी. बाद में उसे वहां के राष्ट्रपति ने उम्र कैद में बदल दिया. 26 जून को खबर आ गई कि उसे सजा पूरी होने पर रिहा किया जा रहा है.

भारत सरकार के विदेश मंत्री श्री एम.एम. कृष्णा ने शुक्रिया भी अदा कर दिया. लेकिन रात में उसकी सफाई में कहा गया कि वह सरबजीत सिंह नहीं बल्कि सुरजीत सिंह हैं, जो भारत की बार्डर सिक्युरिटी फोर्स (बी.एस.एफ.) की 57वीं बटालियन के हैं, जो जासूसी के आरोप में पाकिस्तान की लाहौर जेल में 30 साल की सजा काट रहे हैं. उनकी सजा पूरी होने पर छोड़ा जा रहा है. जाहिर है कि हमें खुशी इस पर भी व्यक्त करनी ही पड़ी की सुरजीत रिहा हो रहा है. उसका परिवार भी यहां बड़ा खुश हुआ. लेकिन सरबजीत के मामले में हमें और उससे ज्यादा उसके परिवार को झटका लगा.

लगता है दिल्ली में पाक आतंकी अबू जिन्दाल की गिरफ्तारी के कारण पाकिस्तान ने मिलते-जुलते नामों को लेकर एक कूटनीतिक चाल चली है. ला मुहाला विदेश मंत्री को सुरजीत की रिहाई पर खुशी जाहिर करते हुए यह भी कहना पड़ा कि पाकिस्तान सरबजीत को भी रिहा कर दे. आम तौर पर यह देखने में आता है कि एक-दूसरे देशों के बीच नागरिकों की गिरफ्तारियों से सरकारों के सामने कूटनीतिक दृष्टिï से बड़ी असमन्जस स्थिति आ जाती है. भारत और पाकिस्तान के बीच सन्ï 1947 में हुये विभाजन समय से ही सांप्रदायिक दंगों व काश्मीर की कटुता चली आ रही है. सीमायें लगी हुई हैं तो ऐसी गिरफ्तारी चलती ही है और यह सिलसिला जारी रहेगा. अबूसलेम की पुर्तगाल में गिरफ्तारी होने की वजह से वहां की सरकार से हमें प्रत्यार्पण के लिये काफी कानूनी जिद्दोजहद करनी पड़ी.

इन दिनों अरब सागर में सोमालिया व यमन के समुद्री लुटेरों की जहाजों को लूटने की घटनायें बड़े पैमाने पर हो रही हैं. हमारे देश का पश्चिमी तट अरब सागर पर है. समुद्री लुटेरों के मुगालते में इटली के माल वाहक जहाज के सुरक्षा गार्डों ने भारत के दो मछुआरों को गोली मार दी. इटली और भारत के बीच भारत-पाकिस्तान जैसी कोई दुर्भावना नहीं है. फिर भी भारत के खास कर केरल के लोगों ने इसे ‘मर्डरÓ माना जबकि यह सब भलीभांति जानते थे कि वह ‘मर्डरÓ नहीं मुगालते में हुई स्थिति जन्य गलती थी. यह सही है कि जो लोग मारे गये उनके परिजनों में क्षोभ व प्रतिशोध रहा होगा, लेकिन हमें उसे इतना तूल नहीं देना चाहिये था.
मछुआरों के बीच अब भारत व पाकिस्तान के बीच स्थिति को व्यवहारिक रूप में लिया जाने लगा. दोनों देशों व भारत श्री लंका के बीच समुद्री सीमा का सही अंदाजा न हो सकने के कारण मछुआरों को पकड़ लिया जाता है. पहले ये लोग वर्षों जेल भुगतते थे, लेकिन अब थोड़ी सी जांच पड़ताल के बाद में दोनों देश इन्हें छोड़ देते हैं. अन्य मामलों में ऐसी गिरफ्तारियों से दो देशों के बीच राजनैतिक, कूटनीतिक आपराधिक, सैनिक रूप के विवाद काफी परेशानी पैदा करते हैं, जिनेवा कन्वेन्शन की तरह ऐसे बाहरी देशों के कैदियों के बारे में संयुक्त राष्टï्र के तत्वावधान में कोई अंतरराष्टï्रीय कन्वेन्शन या संहिता बन जानी चाहिये.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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