राज्य भर में सभी बड़े महानगरों से छोटे नगरों तक समानान्तर बाजार एक विकट समस्या के रूप में सामने आ गया है. सड़क के किनारे के भवनों में ही दुकानें होती हैं. लेकिन अब यह बाजार तीन परतों में ऐसा फैल कर विकृत हो गया है कि सामान्य व्यापार और सामान्य जनजीवन ही ठप्प हो गया है. राजधानी भोपाल के मंगलवारा में ”आजाद मार्केट” के नाम से पूरी सड़कें ही बाजार बना दी गई थीं. यह कहा जाने लगा था कि यहां सब आजाद हैं सबको पूरी आजादी है जहां चाहे दुकान, ठेला, गुमटी रख लो. कई बार प्रशासन ने यहां से यह आजाद मार्केट हटाया लेकिन कुछ ही दिनों में यह फिर से वापस आ जाता है.

एक बार जिला प्रशासन ने वहां की सड़कों पर सिटी बसें चलवा दीं. सिटी बसें कुछ ही दिन चलीं और सड़कों से हट गईं और सड़कों पर बाजार वापस आ गया. इंदौर में भी आवास की एक ”जबरिया कालोनी” है जिसे लोगों ने ”जबरन” बना दिया है. राज्य में गांवों में किसानी जमीन से लेकर महानगरों तक लोगों ने अतिक्रमण ”आजादी से जबरन” कर लिये हैं. अब यही हाल सड़कों और बाजारों तक आ गया है. सड़क के किनारे भवनों में पक्की व व्यवस्था के अंतर्गत दुकानें-शोरूम आदि बने हैं. इन दुकानों के सामने के गलियारे या जगह पर ये दुकानदार ही अपना सामान रख देते हैं. अगर ये न रखें तो हाथ ठेला या फट्टïा बिछाकर बैठने वाले वहीं बैठकर धंधा करने लगते हैं. फुटपाथ पर गुमटियां लग जाती हैं और सड़क किनारे हाथ ठेले दुकान लगाकर खड़े हो जाते हैं. जैसे जमीन के अंदर की परतें टकराने से भूकंप आ जाते हैं, उसी तरह बाजार की यह तीन परतें भी आपस में टकराने से व्यापार धंधा और लोगों का बाजारी करना दुश्वार होता जा रहा है.

फट्टा बाजार के लोग रोज आते हैं और चले जाते हैं लेकिन गुमटी बाजार पक्के बाजार के सामने अस्थाई निर्माण का होने के बावजूद स्थाई रूप से स्थापित हो गया है.  फट्टा व गुमटी बाजारों में नगरीय निकायों के लोग और स्थानीय बाजार माफिया के लोग स्थानीय नेता के रूप में रोजनदारी में जमकर कमाई कर रहे हैं. टैक्सी स्टैण्डों पर भी ऐसे ही स्वयंभू संचालक खड़े होकर अवैध रूप से संचालक टैक्स वसूल रहे हैं. अब जरूरत इस बात की है कि धंधा करने का अवसर सबको मिलना चाहिए इसलिए इस ”तीन परत” बाजारों की परतें अलग कर दी जाएं. पक्की नियमित दुकानों व प्रतिष्ठïनों के सामने कोई दुकान न लगे. फुटपाथ व सड़कों के किनारे गुमटी और फट्टा बाजार न लगे. नगरीय व्यवस्था में बाजारों के आसपास ही ऐसे स्थान बनाये जाएं जहां गुमटी, हाथ ठेले व फट्टा बाजारी अपना धंधा कर सके. अन्यथा सड़कों की तरह बाजार भी ”जाम” हो जाएंगे.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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