जनता को भी बच्चों की तरह बहलाया जाता है. पेट्रोल के दाम 5 रुपये 50 पैसे प्रति लीटर बढ़ाने थे, लेकिन उसे 7 रुपये 50 पैसे घोषित किया. भाव कितने ही कम या ज्यादा बढ़ाये जाते- हो-हल्ला तो होता ही है. इसलिए जन बहकाव या बहलाव में कुछ ऐसा किया ही जाता है. यथार्थ यही है कि पेट्रोल के दाम 5 रुपये 50 पैसे बढ़ा दिये गये हैं. पेट्रोल सस्ता नहीं हुआ है. भाव बढ़ाने के हमेशा से बहाने ढूंढे जाते हैं. एक बहाना तो बहाना नहीं कहा जा सकता कि तेल निर्यातक देश पेट्रो क्रूड के भाव बढ़ा देते हैं, लेकिन इसे आधार बनाकर एक तो आधार मूल्य स्थाई तौर पर निश्चित कर दिया जाए और उसके ऊपर यह तय किया जाए कि पेट्रो क्रूड के मूल्य जिस अनुपात में बढ़ेंगे, उसी अनुपात में मूल्य बढ़ेंगे.

केन्द्र व राज्य सरकारों के बजट में पेट्रो पदार्थों पर कराधान आमदनी के मुख्य स्त्रोत बने हुए हैं. सबसे सब इसमें उनके करों में कटौती करने से कतराते हैं. करते भी हैं तो मुहावरे की भाषा में ‘आने-पाईÓ में करों की कमी करते हैं. जिसका कोई अर्थ नहीं होता यह भी बच्चों को बहलाने का झुनझुना होता है.
पेट्रो पदार्थों की सर्वव्यापी उपयोग व उपयोगिता को देखते हुए इन वस्तुओं को कराधान से मुक्त होना चाहिए. इस मामले में एन.डी.ए. की प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार अब तक की सबसे बड़ी चालबाजी की थी. रसोई गैस के दाम अब तक सबसे ज्यादा वाजपेयी सरकार ने ही बढ़ाये थे. 20 रुपये प्रति सिलेन्डर बढ़ाने थे, लेकिन घोषणा 40 रुपये प्रति सिलेन्डर कर दी. कुछ दिन इन्हीं बढ़े दामों पर बिका. जाहिर है जन आक्रोश भी भड़का, जो सरकारों के लिये अपेक्षित ही रहता है. उस वक्त प्रधानमंत्री बड़ी ”जनभावनाÓÓ से आगे आये और उसे 40 से  घटाकर 20 रुपये कर दिया. घटाते तो 20 रुपये थे लेकिन हकीकत में 20 रुपये बढ़ाये ही थे. इस तरह जनता तो बच्चों की तरह नहीं बहल सकती लेकिन सरकारें जरूर ऐसी बचकानी हरकतें करके बेढंगी चालबाजियां करती ही रहती हैं. पेट्रो पदार्थों के मामले सरकार को गंभीरता से आचरण करते हुए आधारभूत मूल्य नीति स्थाई तौर पर बनानी चाहिए.
अंतरराष्टï्रीय स्तर पर सोना रिकार्ड मूल्य पर भारत में 30,300 रुपये प्रति 10 ग्राम (तोला) हो गया. यह वृद्धि 760 रुपये रही. साथ ही चांदी भी 650 रुपए बढ़कर 54,550 प्रति किलो हो गई. न्यूयार्क व लंदन के बाजारों में सोना में रिकार्ड तेजी आ रही है.
यूरो जोन में ग्रीस व स्पेन के ऋण संकट के कारण पूरे यूरोप में आयात निर्यात व घरेलू आर्थिक व्यवस्था अस्त व्यस्त और ध्वस्त हो गयी है. निवेशक शेयर बाजार सेें अपनी पूंजी निकाल उसे अपनी हिफाजत के लिये सोना की खरीदी में निवेश कर रहे हैं. इससे उनकी पूंजी तो सुरक्षित हो रही है लेकिन इससे उद्योग व्यापार व अन्य आर्थिक गतिविधियों में पूंजी कम होती जाती है. जिसका औद्योगिक उत्पादन पर विपरीत असर पड़ता है और उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन मेन्यूफेक्चरिंग सेक्टर में कम हो जाता है. इससे रोजगार के अवसरों पर बड़ा ही विपरीत प्रभाव पड़ता है.  आर्थिक संकट एक श्रृंखला के रूप में चल पड़ता है.
आर्थिक गतिविधियों में पूंजी की कमी गंभीर संकट का संकेत दे रही है. सोना में निवेश का बढऩा असुरक्षा की भावना से हो रहा है.

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