रियो सम्मेलन में की सतत विकास की अपील

रियो द जेनेरो. 22 जून .ब्राजील के रियो द जेनेरो में आयोजित संयुक्तराष्ट्र पृथ्वी सम्मेलन में दुनिया के विभिन्न देशों से आए 50 हजार से अधिक राष्ट्राध्यक्षों. शासनाध्यक्षों तथा विशेषज्ञों के गरीबी से निपटने की विकासशील देशों की पहल को जारी रखने की अपील के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वैश्विक समुदाय से सतत विकास को बढावा देने के लिए सक्रियता पूर्वक काम करने का अनुरोध किया है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कार्बन उत्सर्जन को कम करने के मुद्दे पर अतिरिक्त वित्तीय तकनीकी सहयोग न देने पर औद्योगिक देशों की आलोचना की है.

रियो द जनेरियो में आयोजित पर्यावरण सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने धनी देशों को आड़े हाथों लेते हुए हरित विकास में उनकी भूमिका की आलोचना की है. ब्राजील के शहर रियो द जनेरियो में पर्यावरण और सतत विकास पर आयोजित सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि स्थानीय स्तर पर प्रदूषण पर काबू पाने के लिए छोटे-मोटे उद्योग धंधों को बंद तो किया जा सकता है लेकिन किसी भी देश को इसके लिए एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी. विकसित देश विकासशील देशों को न तो आर्थिक सहयोग देने को तैयार हैं और न ही तकनीकी सहयोग. ऐसे में विकासशील देशों का कहना है कि वो एकतरफा सहयोग कितना करें.

प्रधानमंत्री ने कहा कि सतत विकास का मतलब है कि आम आदमी को रोटी, कपड़ा और मकान उपलब्ध हो सके. लेकिन अगर छोटे-मोटे उद्योग धंधे बंद होंगे तो इसका प्रभाव आम आदमी पर पड़ेगा. उन्होंने कहा कि कोई भी सरकार अपने लोगों का गला घोंटना नहीं चाहेगी. डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि भारत गऱीबी दूर करने के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विकसित देशों को सतत विकास की ज़िम्मेदारियों पर काम करना होगा. विकासशील देशों को अपने हिसाब से विकास के मॉडल को चुनने की आज़ादी होनी चाहिए. प्रधानमंत्री ने कहा कि विकसित देश चाहते हैं कि विकासशील देश अपने उद्योग-धंधों की रफ्तार कम करें और कार्बन उत्सर्जन के स्तर को तेज़ी से नीचे लेकर आएं. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि विकसित देश विकासशील देशों को न तो आर्थिक सहयोग देने को तैयार हैं और न ही तकनीकी सहयोग.

प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसे में विकासशील देश कितना एकतरफा सहयोग करें. डॉक्टर मनमोहन सिंह ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जो लोग कठिन स्थिति में जीवन जी रहे हैं वे सामंजस्य का खर्च नहीं वहन कर सकते और भूमि, जल, वन जैसे दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनों के मद्देनजर उनकी आजीविका पर विचार करना महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि भूमि एवं जल संसाधनों की गंभीर कमी से हाशिए पर रह रहे लाखों लोगों खासकर महिलाओं और बच्चों का जीवन प्रभावित हो रहा है. अगर आने वाले समय में पर्यावरण को लेकर विकसित देशों के रवैये में सुधार नहीं आया तो कार्बन उत्सर्जन से निपटना मुश्किल हो जाएगा.

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