भोपाल, 28 नवंबर. जन कवि वह है जो जनता के विश्वासों, सपनों और संघर्षों को अपनी कविता का विषय बनाता है और केवल एक कवि के रूप में भाषा और छंद में उसकी अभिव्यक्ति नहीं करता बल्कि जनता के साथ उसकी प्रत्येक सांस के कदम ताल करता हुआ, उसके सबसे भरोसेमंद साथी के रूप में कभी-कभी उसकी अगुआई भी करता है, नागार्जुन ऐसे ही कवि थे.

-डा. विजय बहादुर सिंह
हिन्दी भवन का महादेवी वर्मा सभागार आज बाबा नागार्जुन की जन्म शताब्दी की पूर्व बेला पर उन्हें याद कर रहा था और उपरोक्त उद्ïगार अपने उद्बोधन के दौरान उनके काफी समय तक सानिध्य में रहे डा. विजय बहादुर सिंह ने व्यक्त किये. अवसर था आदिशक्ति साहित्यकला परिषद के बैनर तले वरिष्ठ कवि डा. हुकुमपाल सिंह विकल की अध्यक्षता और वरिष्ठ कथाकार आलोचक रमेश दवे एवं म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन के महामंत्री राजेन्द्र शर्मा के आतिथ्य में आयोजित डा. विजय बहादुर सिंह के व्याख्यान एवं विशिष्टï काव्यगोष्ठी का कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती पूजन एवं विद्या नेगी के आधार वक्तव्य के साथ हुआ. इस कार्यक्रम का संचालन परिषद अध्यक्ष मोहन सिंह ठाकुर द्वारा किया गया. इस अवसर पर अल्पसंख्यक के भाजपा नेता काजी दिलशाद अली भी मंचासीन थे. डा. हुकुमपाल सिंह विकल ने कहा कि नागार्जुन निराला के बाद एक मात्र ऐसे जन कवि थे. जिन्होंने अपने रचनाधर्म से साहित्य को गौरवान्वित किया. रमेश दवे ने अपने उद्बोधन में नागार्जुन की यायावरी का विवरण देते हुए उन्हें जनता जर्नादन को लोककवि कहा. वहीं राजेन्द्र शर्मा एवं मोहन सिंह ठाकुर ने उनकी कुछ चुनिंदा रचनाओं का पाठ भी किया.

काव्य गोष्ठी का आरंभ शायर विजय पंथी की गजल से हुआ. राष्ट्रीय रचनाओं के लिए प्रसिद्घ खलील कुरैशी ने नज्म आदमी कितना खुदगर्ज है, भूल बैठा है क्या फर्ज है, सुनाई जनवादी शायर सलीम तन्हा ने पढ़ा वो कोई बाप हो, भाई हो या कोई धनवान मोहन सिंह ठाकुर ने पढ़ा रोटियों की कीमत फाकाकसो से पूछा, क्यों पूछते हो उनसे जहाँ फिकते निवाले है. इनके अतिरिक्त सुशील गुरु अहम प्रकाश, अल्पना नारायण, विद्या नेगी, डा. राजकुमार नेमा के साथ लगभग 40 रचनाकारों ने अपनी प्रतिनिधि रचनाओं का पाठ कर गोष्ठी को उंचाईयां प्रदान की अंत में मांगीलाल जैन मामाजी द्वारा आभार प्रदर्शन किया गया.

Related Posts: