विद्युत उत्पादन में सब ठीक है और ठीक नहीं भी है क्योंकि हम अपनी जरूरत की बिजली बना नहीं पा रहे हैं. कई विद्युतगृहों में कोयले की कमी से ताप बिजली और डेम में पानी की कमी से जल विद्युत बनने में क्षमता से भी कम उत्पादन होने लगता है. राष्टव्यापी स्तर या केंद्र सरकार के सभी राज्य सरकारें विद्युत उत्पादन बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास करते जा रहे हैं. इसी तैयारी से देश में परमाणु ऊर्जा को भी बड़े पैमाने पर लाया जा रहा है.

लेकिन बिजली की सबसे बड़ी परेशानी और घाटे की वजहें बिजली की अत्याधिक चोरी है. बड़े उपभोक्ता (ब्लक कंज्यूमर्स) से लेकर मध्यम व निम्न वर्ग झुग्गी झोपडिय़ों तक बेतहाशा बिजली की चोरी हो रही है.  ट्रांसमिशन लाइनों पर सीधे तार डालकर न सिर्फ शहरों में बल्कि गांवों में भी सिंचाई के लिए बिजली की चोरी की जा रही है. घरों के मीटरों में चुम्बक रखकर बिजली की चोरी होती है.

इसका सीधा प्रभाव विद्युत उपभोक्ताओं पर पड़ता है. घाटा पूरा करने के लिए बिजली की दरें लगातार बढ़ाई जाती हैं. हाल ही में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने भी इस ओर इंगित किया है विद्युत विकास के लिए दरों में और वृद्धि की जा रही है. लगभग सभी राज्यों के विद्युत मंडल घाटे में चल रहे हैं. उनको घाटे की स्थिति को सुधारने के लिए केंद्र सरकार ने 1.9 लाख करोड़ रुपयों की जारी राशि में इनकी घाटे की स्थिति को सुधारने के लिए फिर से स्वरूप परिवर्तन के लिये (री स्टिकचरिंग) योजना तैयार की है. केंद्र ने यह मान लिया कि राज्यों के विद्युत मंडल दिवालियेपन की कगार तक आ पहुंचे हैं और उन्हें इससे बचाने के लिये ही केंद्र भारी धन राशि उपलब्ध करा रहा है. मार्च 2011 तक राज्यों की विद्युत वितरण कंपनियों का घाटा भी 1.9 लाख करोड़ का आंका गया है. राज्य सरकारें इसका 50 प्रतिशत भाग जो अल्पकालीन बकाया की देनदारी है उसे वहन करेगी. पहले इन्हें बांड में परिवर्तित किया जायेगा.

केंद्र सरकार भी इसी के बराबर 50 प्रतिशत राशि प्रदान करेगी. जिसका मूल्य बिजली बचाने के मूल्य पर आधारित होगा. लेकिन बिजली समस्या फिर भी जटिल समस्या ही बनी रहेगी. जब तक बिजली की चोरी नहीं रोकी जाती यह काम केवल सरकार ही कर सकती है. यदा कदा मुहीम छेड़ी जाती है. फिर वही सब कुछ चलने लगता है. लेथ मशीनें, फेब्रीकेशन, किचन हीटर का काम खुले आम बिजली की चोरी से हो रहा है. केंद्र सरकार इस बार 1.9 लाख करोड़ रुपयों की वित्तीय सहायता से राज्य विद्युत मंडलों को घाटे से मुक्त कर देगा, लेकिन आगे से वे पुन: कर्जदार व घाटे का धंधा न बने इसका क्या निदान ढूंढा जा रहा है. मुख्य समस्या और समाधान यही है?

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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