श्री प्रणव मुखर्जी 25 जुलाई 2012 को भारत के 13वें राष्टï्रपति पदारूढ़ हुए. वे अभी तक वित्त मंत्री के रूप में दिल्ली के 13 तालकोटरा रोड के शासकीय आवास में रह रहे थे. उनकी शादी भी 13 जुलाई 1957 को सुभ्रा मुखर्जी से हुई थी. एक संयोग यह भी है कि वे कभी पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार या राजनीति में नहीं रहे. उनकी राजनैतिक शुरुआत जुलाई 1969 में राज्यसभा के सांसद चुने जाने से हुई और जुलाई 2012 तक संसदीय जीवन चला और जुलाई माह में ही वे संसदीय राजनीति से देश के राष्टï्रपति बनकर संवैधानिक राजनीति में आये. जुलाई 67 से जुलाई 2012 तक 45 वर्ष उनका राजनैतिक सफर बड़ा सफल व मृदुभाषी व्यक्तिका रहा.

उनके चुनाव के मतदान की बड़ी विशेषता यह रही जहां उन्हें अपने गृह राज्य पश्चिम बंगाल से 275 का भारी बहुमत मिला और प्रतिद्वंदी को श्री संगमा को मात्र 3 वोट मिले. वहीं श्री संगमा के गृह राज्य मेघालय में भी श्री मुखर्जी को 34 वोटों का बहुमत और श्री संगमा को 23 वोट ही मिले. श्री प्रणव दा को कुल 7,13,763 और श्री संगमा को 3,15,987 वोट मिले. इससे यह भी नहीं कहा जा सकता कि दोनों के बीच कड़ा मुकाबला हुआ. श्री संगमा की इतनी बड़ी हार को उनकी अपेक्षाओं के विपरीत ‘चमत्कारी हारÓ कहा जा सकता है.

राष्टï्रपति के रूप में अपने प्रथम उद्बोधन में विश्व को यह कहकर एक यथार्थ से परिचित कराया कि आतंक सारी दुनिया में कभी भी कहीं भी हो रहा है इसलिये इसे विश्व युद्ध माना जाए. यह एक चुनौती है और दुनिया को इससे इसी स्तर पर वैश्विक स्तर के युद्ध से निपटना होगा. देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर कहा कि इससे ही देश का विकास रुक गया है. राजनैतिक प्रशासकीय स्तर से होता हुआ भ्रष्टाचार निम्र स्तर तक पहुंच गया है. राष्टï्र के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है. अर्थ-व्यवस्था का लाभ सबसे गरीब तक पहुंचना चाहिए. भूख और गरीबी मिटाये बिना विकास अर्थहीन रहेगा.

साझा सरकारों के बारे में श्री मुखर्जी ने कहा कि यदि खंडित जनादेश आता है तो यह प्रक्रिया चलती है. देश में लगभग 45 साल पूर्व बहुमत की कांग्रेस व जनता पार्टी की सरकारें रही हैं. साझा सरकारों का समय अभी मात्र 20 साल का है. पूर्ण बहुमत की स्थिति में यह दौर स्वयं ही समाप्त हो जाता है. देश को ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए उच्च शिक्षा को भी हर व्यक्ति और स्तर तक पहुंचाना होगा. हमारी कृषि को उन्नति के लिए और अधिक प्रोत्साहन देना होगा. प्रजातंत्र का अर्थ पांच साल में एक बार वोट देना मात्र नहीं है, हमेशा देश की उन्नति में सक्रिय होना पड़ेगा.

संसदीय अवरोधों पर श्री मुखर्जी का विचार था कि वैचारिक टकराव संसदीय प्रणाली व प्रक्रिया का अंग है. लेकिन इससे संसदीय अवरोध नहीं होने चाहिए. इससे सरकार या विपक्ष किसी को कुछ हासिल नहीं होगा. यदि संसद में विचार डिबेट नहीं होगी तो फिर और क्या होगा?
श्री मुखर्जी को इस बात पर गर्व है कि वे केवल यूपीए के उम्मीदवार नहीं थे. उन्हें शिवसेना, जनता दल यूनाईटेड और कई ऐसी पार्टियों का भी समर्थन था जो यूपीए के विरुद्ध है. सपा, बसपा ऐसी पार्टियों का भी समर्थन रहा जो यूपीए सरकार में शामिल नहीं हैं. इस भावना से यह जाहिर हो जाता है कि श्री मुखर्जी दलीय परिप्रेक्ष्य में नहीं बल्कि राष्टï्रीय परिप्रेक्ष्य में अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करेंगे. उन्होंने कहा कि प्रजातंत्रीय प्रक्रिया में बड़ी शक्ति है. इससे सभी समस्याओं का निराकरण और उपलब्धियां पायी जा सकती हैं. भारत के लोगों को इन 65 सालों की आजादी में यह समझना होगा कि वोट देने से बड़ी जिम्मेदारी सतत् भागीदारी में है. सभी को विकास व प्रगति से पूरे समय भागीदारी भी करनी है.
राष्टï्रहित में सबसे जरूरी है कि साझा सरकारों का दौर खत्म हो. उत्तर प्रदेश में यह कभी बसपा और कभी सपा को स्पष्टï बहुमत देकर किया है. मध्यप्रदेश इस प्रगति में सबसे आगे है. यहां काफी लंबे समय से संसदीय आदर्श प्रणाली ”टू पार्टी सिस्टमÓÓ कांग्रेस व भाजपा के बीच बना दिया गया है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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